कानपुर 20 अप्रैल। कोरोना के खौफ ने मजहब को मर्ज के चश्मे से देखने की सीख दे दी। ऐसा कानपुर में पहली बार होगा कि किसी मोमिन की मौत होने पर उसे बिना गुश्ल के ही कब्र में जाना होगा, शहर उलेमाओं की अपील के बाद पहले से दहशत में जी रहे तमाम मुसलमानों में इसे लेकर बहस छिड़ी है कि क्या वाकई ये सही है पर मजबूरी और अल्लाह की हिदायत के सामने सब मजबूर है। शहर काजी मौलाना ओसामा ने तमाम मुसलमानों से अपील की है कि कोरोना से अगर किसी मोमिन की मौत होती है तो उसके जनाजे को बिना गुश्ल (नहलाने धुलाने) से परहेज करे और बिना गुश्ल के ही दफनाया जाये ताकि बाकी लोग सुरक्षित रहे। मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत कोरोना से मरने वाले व्यक्ति को मेडिकल बैग में कवर करके शव सौंपा जाता है ताकि कोरोना न फैल सके। इस अपील के बाद मुस्लिमों में बहस जारी है। वहीं शरिय तौर पर जहां उलेमा इससे इत्तेफाक तो नहीं रखते है पर कोरोना के खौफ ने साबित कर दिया कि मजहब के चश्मे से मर्ज को नहीं देखा जा सकता है। जबकि कुरान में मोमिन के लिये गुश्ल को बेहद जरूरी बताया गया है। इस पूरे प्रकरण में शहर के कई नेता, समाजसेवियों की अपनी अलग अलग राय भी है।
से बहुत इम्तिहान का वक्त है खुदा हम सब का सब्र देख रहा है, कोरोना के कारण बिना गुश्ल के मैय्यत दफनाना जायजा नहीं है पर मजबूरी है जिसे हम अल्लाह की मर्जी ही मानते है, उलेमाओं ने जो कहा उस पर अमल करना चाहिये। साकिब जावेद, युवा नेता जाजमऊ
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