#जब तपती धूप में खाने के लिए दौड़ी नंगे पैर दौड़ी परी #पैसा #गरीबी #corona #lockdown #tears #Road #सड़क

कानपुर 23 अप्रैल। आठ साल की उस मासूम को नहीं पता था कि लॉक डाउन क्या होता है... पर उसे भूख पता थी, उसे मां के आंसू मालूम थे.. किसी भी कार को फूटपाथ किनारे रूकता देख ये मासूम परी नंगे पैर दौड़ लगा देती कि शायद कोई दानदाता उसकी भूख मिटा देगा... ये कोई सिर्फ एक कहानी नहीं है...एक बच्ची की दर्दभरी हकीकत है.. जिसे मैने अपनी आंखों से देखा। बुधवार की दोपहर करीब एब बजे होंगे.. फजलगंज के  फायर ब्रिगेड कब्रिस्तान के सामने मै बाइक रोक कर किसी से बात कर रहा था। तभी एक कार रूकी जिसमें दो युवक थे। तभी एक बच्ची करीब आठ साल की नंगे पैर दौड़ते हुए कार के करीब पहुंची ही थी कार चल दी। यह देख मै उस बच्ची को देखने लगा। उसके गंदे कपड़ों के बीच उलझे बाल और मासूम सांवले चेहरे पर मायूसी और आंखों में उम्मीद के जलते दीये मैने देखे थे। उसे करीब बुलाया तो सकुचाते हुए पास आयी, मैने पूछा कार के पास क्या करने गयी थी..बड़ी मासूमियत से उसने कहा खाना लेने, कल से किसी ने कुछ खाया नहीं, अम्मा भी रो रही थी... मैने उसका नाम पूंछा पर कुछ नहीं बोली और जाने लगी.. उसे आवाज दी और बुलाया, जेब से कुछ पैसे निकाल कर दिये तो उस बच्ची की जुबान से सिर्फ इतना निकला पैसे से कुछ मिलेगा नहीं खाना नहीं है क्या, इतने सुनते ही मेरी आंखे नम हो गयी थी। मैने पूंछा कि बेटा कहां रहती हो उसने दादानगर पुल की तरफ इशारा किया वहां मेरा घर है, मैने फिर पूंछा कि खाना देने वाले आते होंगे, तो मासूमियत से कहा आयें होगे पर हमे पता नहीं चला कल शाम के बाद खाना नहीं मिला, भूख लग रही है कार वाले अंकल भी आज नहीं आ रहे है। अम्मा भी भूखी है रो रही है.. मेरा कलेजा मुंह में गया था, मुझे मेरे बच्चों के चेहरा याद आने लगा। आसपास नजर दौड़ायी पर कोई ठेले वाला तक नहीं था। मैने उसे रूकने के लिये कहा और विजय नगर भाग कर गया एक दर्जन केला लेकर पहुंचा और उसे बुलाकर दिया। पर मेरा मन काफी भारी था.. सोंच रहा था कि लॉक डाउन ने क्या सिर्फ सामाजिक दूरियां तोड़ी है या फिर भूख का जिस्म से नाता जोड़ दिया। दूसरे दिन मै वहां से फिर निकला और उस बच्ची को खोजा पर वहां नहीं मिली, पर दर्जनों गरीब परिवार नाले किनारे फूटपाथ पर मुझे देख रहे थे उनकी बेबस निगाह मानों कह रही थी, कोरोना से नहीं पर भूख हमे एक दिन जरूर मार देगी। कुछ लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि खाने का सामान कई दानवीर दे जाते है पर बेरोजगारी उन्हें हर पल भूख का अहसास दिलाती है...
इस पूरे वाक्या से दो चार होने के बाद मन से एक बात निकली..
भूख न देखे जात पात.. भूख न देखे महामारी
बेबसी है आंखों में... चेहरे पर मायूसी, और पेट है खाली
पठान की कलम से...

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