चला था ढूंढने उन्हें जो मेरी कलम को आयाम दे दे, मिला सड़क पर मुस्तेदी से ड्यूटी करते वो खाखी वाला
पूछा जो हाल उससे उसका, दर्द उसका भी कलम को पैगाम दे गया
दिन के करीब दो बजे थे, शहर के एक संवेदनशील क्षेत्र में कोरोना काल में हॉट स्पॉट वाले क्षेत्र में एक सिपाही डंडा लिये, मास्क पहने सड़क किनारे गर्मी के अहसास के साथ छांव में खड़ा था, पर उसकी निगाह सड़क पर थी, जैसे ही कोई बाइक से निकलता उसे रोक कर बाहर निकलने का कारण पूंछता और समझा कर वापस करता, बेहज जरूरी होने पर ये कहकर जाने देता भाई आप घर में रहेंगे तो हम भी जल्दी घर जा पायेंगे...इन्हीं संवादों केबीच सिपाही का फोन बजता है.. उधर से एक मधुर आवाज आती है जो उसकी आठ साल की बेटी की थी.. बेटी पूंछती है पापा इतने दिन हो गये आप घर नहीं आये.. आप ठीक तो हो.. उस मासूम बिना रूके कहा पापा आज मेरा जन्मदिन है..मम्मी ने घर में खीर बनायी है पर बाहर नहीं जाने दे रही है.. सिपाही पिता ने समझाया कि बिटिया अगर आप लोग घर में नहीं रहोंगे तो कोरोना को कैसे मात देंगे, फिर हम भी घर कैसे आयेंगे, उधर से बेटी ने कुछ ऐसा कहा कि सिपाही की आंख नम हो गयी.. ये वाक्या सिर्फ एक सिपाही का ही नहीं बल्कि शहर में तैनात सिपाही, दरोगा, इंस्पेक्टरों का भी है। परिवार से दूर नौकरी निभा रहे ये खाकी के ये फरिश्ते आखिर क्यों अपनी जान जोखिम में डालकर अपना फर्ज निभा रहे है?क्या इन्हें कोरोना से डर नहीं लगता है? बिल्कुल लगता जनाब है.. पर इनका दर्द कौन समझे। दरअसल खाकी के कुछ ऐसे लोग जिनकी करतूतों से पूरा महकता शक की निगाहों से देखा जाता है। आम आदमी हो या खास सभी की निगाह में भ्रष्ट, कु्ररू छवि इसी पुलिस की बनी हुई है। जबकि समाज मेंं सबसे अहम किरदार इसी खाकी का है। जब कहीं सड़ी गली लाश मिलती है तो यही खाकी उठाती है, जिसे देखकर हम मुंह पर रूमाल रखकर दूर हट जाते है। कोरोना कॉल में हॉट स्पॉट वाले क्षेत्रों में जब स्वास्थ्य विभाग टीम जाने से डरती है तो यही खाकी साथ जाती है बिना किसी बचाव संसाधन के। पोस्टमार्टम कराने से लेकर वीआईपी डयूटी हो या फिर धार्मिक उंमांद जैसे प्रकरण हर जगह खाकी ही तो डटी रहती है। जब कहीं झगड़ा होता है तो खाकी यादी आती है.. गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात हो जब किसी पर मुसीबत आती है तो पहले खाकी से ही तो मदद मांगते है।
कभी सोंचा है परिवार से दूर कई महिनों तक त्योहार तो कभी कोरोना तो कभी आपदा के नाम पर छूटटी नहीं मिलती। न खाने की व्यवस्था और रहने को अच्छे घर। फिर भी जिन्दंगी जीते ये खाकी वाले समाज के हर काम आते है। जब त्योहार में हम और आप खुशियां मनाते है तो कभी सोंचा है कि इन्हें इनका परिवार कितना याद आता होगा.. इनके भी बच्चे, पत्नी, मां बाप है, बीमारी हो या शादी हर जगह नहीं पहुंच पाते क्यों्िरक इन्हें इनके फर्ज ने बांध रखा है।
मेरा मकसद सिर्फ इनकी तारीफ करना नहीं है.. बल्कि समाज को यह बताना है कि खाकी भी हमारी तरह ही है इसमें जो इंसान है उसका भी दिल है, परिवार है, जरूरते है और जिम्मेदारी भी है।
जब हम घरों में रहोंगे तभी तो कोरोना का मात देंगे, और खाकी के ये योद्धा अपने घर जा सकेंगे।
इसलिये अबकी बार जब घरों से बेवजह निकलने की सोंचियेंगा तो इनका ख्याल भी करियेगा, कदम खुद रूक जायेंगे।
मै एक पत्रकार हूं, खाकी हो या अन्य विभाग सभी को बेहद करीब से जानता हूं.. यकीन मानिये पुलिस महकमा ही एक ऐसा महकमा है जो सबसे ज्यादा शोषित है। पर किसी से कुछ नहीं कहता है, किसी चौराहे पर किसी पुलिस वालें को डंडा लिये हंसते हुए देखियेगा तो ये मत सोचिंयेंगा कि वह बहुत खुश है उसके पीछे का दर्द जाननें की कोशिश करियेगा।
शाहिद पठान की कलम से....9793045666
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