आज मातृ दिवस है, सोशल मीडिया से लेकर टीवी कीसुर्खियों में मां का अक्स नजर आ रहा है। हर बेटा, बेटी मां.. मां करती नजर आ रही है। मै भी देश की उन सभी मांओं को नमन करता हूं जिन्होंने पूरी जिन्दगी अपने बच्चों के लिये अपनी खुशियों की बलि चढ़ा दी। फिर अचानक याद आया कि इस शहर में चौराहों पर कई मां, हर रोज भूखी सोती है.. कई मां वृद्वाआश्रम में इस इंतजार में है कि कब उनहें मौत आ जायें, कई मां जेल में भी है तो कई मां ऐसी भी है जिन्होंने अपने बच्चों के लिये अपना जिस्म बेंचने में भी संकोंच नहीं किया। मै इन सभी मांओं को चरण को भावपूर्ण होकर स्पर्श करता हूं। मेरी मां नहीं है.. इसलिये हर अक्स में मां को खोजता हूं। अब आता हूं असल मुद्दे पर। मेरा ये ब्लाक उन सभी देवियों, सज्जनों को कचोटेगा. और कचोटना भी चाहियें, क्योंकि मैने यह लेख उन्हीं महान आत्माओं के लिये लिखा है जो आज मातृ दिवस पर शान से सोशल मीडिया पर मां की फोटो लगाकर घडियाली आंसू बहा रहे है। सब एक जैसे नहीं होते इसलिये अपनी मां के साथ एक परिवार के सूत्र में बंधे उन बेटों और बहूओं को सलाम भी कर दे रहा हूं, नहीं तो कहेंगे पठान ने सभी को एक तराजू में तौल दिया। दरअसल पिछले साल शहर के कुछ आश्रमों में गया था कवरेज करने। वहां कई माताओं की आंखू में आंसू कम गुस्सा ज्यादा था। गुस्सा शायद अपने जिंदा होने, कईयों के बेटे भी आयें थे, जो पूरा प्यार दिखा रहे थे, पर वो मां थी उन्होंने कलेजे के टुकड़े को गले लगाकर दूआ देने में संकोंच नहीं किया। बहुत कुरेदातो एक मां के आंसू दिल से होकर आंखों में आ गये। बताया कि दो बेटे है, दोनों की शादी हो गयी। दो साल में पति की मौत हो गयी और बहूओं ने घर में राज जमा लिया। बड़ी छोटी बहू में पटरी नहीं खाई पहले कमरे अलग हुए, फिर आंगन और फिर मां बंट गयी। एक दिन बड़ी बहू को फोन पर बात करते देख सास ने टोक दिया, फिर क्या था, घर में कोहराम मच गया। दो माह नहीं लगे, बहू ने सास को थप्पड़ों से पीट दिया। आखिर वो मां थी, उसका स्वाभिमान था, इसलिये घर छोड़ने का हुक्म बेटा बहू को सुना दिया, पर हर बेटा राम नहीं होता, बेटों ने कोर्ट का रास्ता दिखाते हुए सीधे कह दिया हमे खुश देखना चाहती है तो आप चली जाओ, नहीं तो हम जान देंगे, आखिर मां थी क्या करती, बेटों को निहारती रही पर बहूओं की मदमस्द हुस्न में डूबे कलयुगी बेटों को मां पर दया नहीं आयी और उन्हें उनके स्थान पर पहुंचा दिया। आज वो मां इस दुनियां में नहीं है। बुझे मन से वापस आ गया। ये कोई कहानी नहीं इस शहर की हकीकत है। जिनकी औलादें मां को इज्जत दे रही है वो बहुत खुशनसीब है और जिनकी मां बच्चों के साथ है समझों पूरी कायनात उनके साथ है। इस शहर में मांओं के साथ दर्द की इंतहा से ज्यादा जुल्मों की कहानी हर वृद्वाआश्रम में मिल जायेगी, जेल में मिल जायेगी।
इसलिये सड़क किनारे स्टेशन, बस अड्डे या कहीं भी कोई मजबूर मां दिखाई दे तो एक बार जरूर पूंछना मां हो या आभागी मां...
साभार बर्निग न्यूज
इसलिये सड़क किनारे स्टेशन, बस अड्डे या कहीं भी कोई मजबूर मां दिखाई दे तो एक बार जरूर पूंछना मां हो या आभागी मां...
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