आखिर कब बंद होगा धर्म के नाम पर चल रहा गोरखधंधा?

पिछले कई दिनों से देर रात तक जागने की चेन टूट गयी थी। कोरोना देवता ने जिंदगी के मायने बदल दिये। कुछ दिन से देर रात तक जागते हुए कई ख्याल आये। अचानक सोंच अल्लाह और ईश्वर पर आ गया। वैसे तो ऊपर वाला एक ही है। मैने कभी जयश्री राम बोलने में परहेज नहीं किया। क्योंकि बचपन भी तो रामायण देख कर बीता है। अल्लाह हूं अकबर हर कोई बोले ऐसी मेरी कोई मंशा नहीं है। आगे जो लिखना जा रहा हूं धर्म के ठेकेदारों को थोड़ा बुरा लग सकता है। जरूरी नहीं कि मेरी सोंच सही हो, पर कोरोना देवता ने सोंच तो बदल दी। दरअसल भारत देश में हिंदू देवी, देवताओं की पूजा अर्चना करने वाले लोगों की मान्यता अलग अलग है। वहीं अल्लाह एक है और उसकी इबादत करने वाले मुस्लिमों का दूसरा कोई हो नही सकता है। पर इन सब के बीच एक बात अचानक दिमाग में आयी। पहले बात मुस्लिम समुदाय से ही कर लेता हूं ताकि किसी को बुरा न लगे। हमारे यहां के मौलाना, आलिम और जमातियों ने हमेशा एक बात सही कही है कि अल्लाह एक है और उसकी ही इबादत करनी चाहिये। वहीं हिंदू धर्म में 33 करोड़ देवी देवताओं का जिक्र है, जबिक हिंदू ग्रंथों के अनुसार उन 33 करोड़ देवी देवताओं का मायने ही कुछ और है दरअसल ऐसा है ही नहीं। दरअसल धर्म के ठेकेदारों ने ईश्वर का डर दिखाकर इंसानों के सोंचने की दिशा ही बदल दी है। मंदिर बन गये मस्जिद बन गयी,धर्म की रक्षा के नाम पर खून खराब भी होने लगा क्योंकि धर्म के ठेकेदारों में कई राजनीतिज्ञ चोला जो ओढ़ चुके है। कोरोना का धन्यवाद कीजिये.. उसी ही क्यों सभी आपदाओं का धन्यवाद कीजिये जिसने ये सिखाया कि बुरे वक्त में इंसान इंसान का काम आता है। ईश्वर ने नियती लिखी है ताकि इंसान को सबक मिले पर धर्म के ठेकेदार मंदबुद्वी होते जा रहे इंसानों को आगे नहीं बढ़ने देते । दो माह से मंदिरख् मस्जिद, मक्का मदीना, वैष्णोंदेवी समेत सभी धार्मिक स्थल बंद है। सवाल है क्या अब वहां न जाने से भगवान इंसानों से नाराज हुआ होगा। दरअसल ऐसा होता भी नहीं है। ईश्वर कभी ये नहीं कहता है कि मेरे दर पर आकर ही मेरा अराधाना, इबादत करों, पर ये जरूर कहता है कि मानवत को बनायें रखे, मेरे बताये रास्तों पर चलों, बुरा करों नहीं बुरा होगा, अपनी स्त्रीयों की इज्जत चाहते है तो दूसरों की इज्जत करना सीखों, जब सब कुछ ईश्वर ने पहले ही बता दिया तो जरूरत क्या है मंदिर, मस्जिद जाने कि। दो माह से हर कोई घर में बेठ कर चलते फिरते ईश्वर को याद कर रहा दुआ कर रहा, मन्नते मांग रहा है । ऊपर वाला भी कर्मो के हिसाब से बंदों की मदद कर रहा है। कभी पुलिस वालों को भेजकर, डॉक्टर, वकील, पत्रकार, हर रूप में अपने वजूद का वहम इंसानों को करा रहा है।  तो हे ईश्वर, अल्लाह के बंदों, अगली बार धर्म के नाम पर झगड़ने से पहले सोंचना है दुनियां इंसानों से चलती है, मानवता से चलती है। धर्म के नाम खर्च करने से बेहतर है गरीबों की मदद करों, विधवा महिलाओं, यतीम बच्चों, बुजुर्गो, बीमार, और सड़क पर पड़े लोगों के लिये दान करों, धर्म के ठेकेदारों की ऐश आराम के लिये नहीं। क्योंकि भगवान को हमारे दान  की जरूरत नहीं है। ईश्वर तो हर जगह है उसे सच्चे मन से कहीं से याद कर लो, वो हमेशा साथ रहेगा। ऐसा मैने इसलिये लिखा की कोरोना का खौफ कम होते ही धर्म के ठेकोदरों का धंधा चलाने के लिये स्वांग रचेंगे, फिर चाहे वह दरगाह हो, या मंदिर हो। सोचियेगा दरगाह, मंदिर के बाहर बैठा गरीब हमेशा गरीब ही रहता है पर अंदर बैठे ठेकेदारों की पीढियां ऐशो आराम से जिन्दगी जीती है। मंदिर जाओं, मस्जिद जाओ, दरगाह जाओ पर किसी गरीब के काम आयों यही बड़ा पुण्य है..

Comments