आखिर कब खत्म होगा ये सफर

राष्ट्रनिर्माता की भूमिका निभाता हूं, मंजिलों को पैदल ही नाप जाता हूं.. शिकवा फिर भी नहीं कर पाता, चुनाव में हिंदू, मुस्लिम बन जाता हूं.. भूखा हूं, प्यासा हूं, रास्तों पर बिलखता हूं.. क्योंकि मै मजदूर हूं.. क्योंकि मे मजदूर हूं..
हाईवे हो या बस अड्डे, या फिर स्टेशन हर जगह मजबूर, मजदूरों का जत्था इंसानियत को झकझोरता दिखायी दे रहा है। सोचियें बीवी बच्चों के साथ सुनसान सड़क किनारे बिना किसी सुरक्षा के घर वापसी के लिये मजदूरों का दर्द कैसा होगा। हर वक्त किसी अनहोनी का डर, भूख, प्यास से तड़पती बच्चों के चेहरे कितना दर्द देते होंगे उसे पिता को जिसने उन्हें दो वक्त की रोटी देने के लिये सैकड़ों मील दूर दूसरे शहर में आने को मजबूर किया। क्या वोट देते वक्त इन मजदूरों ने सोंचा था कि सरकार उनके साथ ऐसा करेगी। फिर भी किसी ने शिकायत नहीं की बस दुख बयां किया। सीधा सवाल है कि हर मोर्चो पर सरकार की जुमलेबाजी ही सामने आती है। रोजगार मांगो तो, मंदिर मस्जिद में उलझा दिये जाते है, सवाल करो तो राष्ट्रद्रोही बता दिये जाते है। कोरोना के आने की दस्तक भारत पहले समझ चुका था, फिर क्यों नहीं सरकार ने इसके लिये मजबूत रणनीति बनायी। लॉक डॉउन करने से पहले अगर सरकार दस दिन का वक्त देकर मजदूरों को घर वापसी के लिये ट्रेन, बसों में फ्री कर देती, ये बता कर अगले दस दिन बाद संपूर्ण भारत में महामारी से बचने के लिये लॉक डाउन किया जायेगा। तो शायद लाखों मजदूर इतना परेशान नहीं होते। 52 दिन के लॉक डाउन में हर वर्ग टूट गया। पर हम फिर से वहीं आ गये जहां से शुरूआत की थी। जिंनदगी बचाने के नाम जिन्दगी मुशकिल में पड़ गयी। न रोजगार है, न व्यापार है, न स्वास्थ्य सेवाओं का भण्डार है। सब कुछ जुमलेबाजी में चल रहा है। सोशल डिस्टेसिंग का ये हाल देखकर तय है कि कोरोना से ऐसे नहीं जीत पायेंगे। अगर ऐसे ही जीतना था तो 52 दिन से देश की अर्थव्यवस्था को थामने वाली सरकार बताये कि उनके पास ऐसा क्या मास्टर प्लान है जिससे इस महामारी को रोका जा सके। आर्थिक पैकेज का लाभ जब मिलेगा तब मिलेगा। पर इन 52 दिनों में इंसान ने दर्द के वो सभी मुकाम देख लिये जो शायद कभी नहीं देखे थे। सोचिये आकलन किजियें.. कहां हमसे चूक हुई, कहां सरकारों ने गलतियां की, और कौन इसका खमियाजा भुगत रहा है।  इन मजदूरों का दर्द सरकार नहीं समझ सकती। श्रमिक ट्रेने तो चला दी पर दो माह से बेराजगारी में बैठे मजदूर पैसा कहां से लायेंगे। जो अब किया- क्या पहले ये कदम सरकार नहीं उठा सकती है?

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