भूख, प्यास, मासूमों के तपती सड़क पर जलते पैर.. पूंछती है सवाल क्या रही सरकार

 चेहरे पर उदासी, आंखों में आंसू.. लड़खड़ाती जुबान पेट की भूख से ज्यादा उस दर्द को बंया कर रही थी, जो शायद हम और आप कभी महसूस न कर सके। गंदे से कपड़ों में कोई बैग टांगे तो कई बच्चे को कंधे पर बैठाये चला जा रहा था। घिस चुकी चप्पल में कोई कंकर चुभता तो पीछे से आती पत्नी की मार्मिक पुकार... अरे रूकिये कंकर चुभ गया। आसपास भोजन बांटने वालों को निहारती प्रवासियों की निगाहे सरकारे के निकम्मेपन को मानो कोस रही थी। सभी का दर्द एक जैसा था। अगर कुछ बदला था तो उसका रूप। कोई पांच सौ किलोमीटर पैदल चलकर आ रहा था, तो कई हजार किलोमीटर पैदल चल कर आ रहा था। दोपहर के करीब 1 बजे होंगे, झकरकटटी  बस  अड्डे के पास तीन चार युवकों के साथ दो महिलायें और दो छोटे बच्चे भी बैठे थे। कुछ खाना देने वाले पहुंचे तो सभी का दर्द एक जैसा था। दिल्ली के पहाड़गंज में मजदूरी करते थे। लॉक डाउन के बाद जिन्दगी की गाड़ी जैसे तैसे गुजारते रहे। एक सवाल तो सरकार से बनता है, आपने तो रोजगार, देने के साथ हिफाजत करने का वादा भरकर वोट मांगा था। आज मजदूर सड़कों पर पैदल चले जा रहे है क्यों नहीं सरकार के हुक्मरानों को यह दिखायी नहीं देता।क्या सरकार मजदूर महिलाओं क दर्द नहीं दिखता, धूप में जलते उन मासूम बच्चों के पैरों की आह क्यों नहीं सरकार तक पहुंच रही है। क्या वोटों और हिंदू, मुस्लिम की राजनीति कर इंसानों की जिन्दगी से सौदा करती रहेगी सरकार। प्रधानमंत्री जी आपने तो बहुत सरलता से कह दिया आत्मनिर्भर बनना होगा, पर कैसे, मजदूर के जेब में पैसा नहीं है, रोजगार नहीं है, पेट में अन्न नहीं है, बच्चों के जलते पैर, पत्नी, बेटी, बहन, मां की बेबसी और थकतें पांव सवाल कर रहे है, आखिर क्या गलती है हमारी। ऐसे बहुत से मजदूर है जिनकी कहानी दर्द की इंतहा के पार है। कई तो इतने स्वाभीमानी है कि मांग कर खाना तक नहीं खा रहे है, बावजूद इसके उन्हें शिकवा भगवान से नहीं है पर सरकारों से है। thanx to burning news 


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