इस तस्वरी के कई रंग मेरे सामने सामने आये। यूं तो लॉक डाउन में न जाने कितने मासूमों की दर्द भरी चीखेंं, उनकी आंखों से बहते बेबसी के आंसू और तपती जलती सड़क पर मासूमों के बेरंग होते बचपन को देखकर मन रो पड़ा था। हमारे कानपुर शहर के वरिष्ट फोटोग्राफर गजेन्द्र भाई ने ये तस्वीरें झकरकटटी बस अड्डे से ली। सोशल मीडिया में मेरे मित्र राहुल ने इसे साझा किया। इन तस्वीरों को देखकर मेरा मन बहुत द्रवित हो गया। अल्फाज गूंगे हो गये, मानवता ने इतना झिझोंड़ दिया कि खुद पर शर्म आने लगी इंसान होकर कैसे मदद करूं.. लॉक डाउन के बाद जिस तरह से पैदल निकले मजदूरों के साथ उनके मासूम बच्चों ने भविष्य का सबसे बुरा दौर देखा अल्लाह न करे कोई दोबारा देखे। ये मासूम मां के साथ बहराईच जाने के लिये निकला है। कई मील पैदल चलने के बाद झकरकटटी बस अड्डे पर बस मिलने की खुशी मासूम की आंखों में थी, पर कई कोशिशों के बाद भी इसे बस में सफर की इजाजत नहीं मिली तो इस बच्चे के सब्र का बांध टूट गया। भूख, प्यास तो पहले ही निढाल किये हुए थे। अपने ही देश में गैरों सा व्यवहार ने इस मासूम के दर्द को बढ़ा दिया। आंखों से रोते इस मासूम के सर पर मां ने ममता का हाथ फेंरा तो शांत हुआ इस उम्मीद के साथ आगे कोई सवारी मिलेगी। सवाल है इस मासूम के मन में क्या चल रहा होगा सोचियेंद्ध। अपने ही देश में सिस्टम से मजबूर खुद की बेबसी से ज्यादा मां के दर्द से परेशान होगा। मां को पैदल चलता देख, लोगों से मदद मांगने पर सिर्फ इधर से उधर दौड़ाने की प्रक्रिया और मां को हताश होता देख इसके मन में यही चल रहा होगा कि मेरी मां तो दुनियां में सबसे अनमोल है उसे लोग परेशान कर रहे है। मासूम को नहीं मालूम की उसकी मां जैसे न जाने कितनी मांऐ सिस्टम और गंदी राजनीति की शिकार हो रही है। ये महिलायें पैदल, चल कर घर जाना चाहती है पर मदद करने वाला कोई नहीं है। बस चल रही है पर जब इन माताओं और मासूम बच्चे को बस मुहैया न हो पायी तो क्या फायदा ऐसी व्यवस्था का। लफ्ज तो बहुत है इस दुर्दशा को बखान करने के लिये। बयां सिर्फ मजबूरी और एक मासूम का दर्द उसके आंसू का दर्द आप तक पहुंचाने का था, ऐसे किसी मां और बच्चों को देखकर नजरअंदाज न करियें उनकी मदद करियें।
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