कमर में तमंचा..मुंह पर गाली..हो रही पत्रकारिता, गुंडों वाली..

अपनी ही अदालत में मै ही जज हूं.. मै ही मुजरिम...मै ही वकील हूं ... मै किसी व्यक्ति, संस्थान या व्यक्तिगत नहीं रूप से नहीं बल्कि मीडिया के बदलते चेहरे की बात कर रहा हूं जिसमें मै भी शामिल हूं।
फैसला भी हमे करना, सजा भी खुद भुगतनी और पैरवी भी खुद ही करनी है क्योंकि पत्रकारिकता जिस दौर से गुजर रही है। उससे एक बात तो साफ है कि आज के वक्त में सरकार के हिसाब से नहीं चलोगों तो कुचल दिये जाओंगे, संस्थान के हिसाब से नहीं चलोगें हस्ती मिट जायेगी, और अनाप शनाप शौक पूरा करने है तो सारे गलत काम करने पड़ेगें। जर्नालिज्म आज उस दौर में पहुंच गया है जहां शराब, कबाब, ब्लैकमेलिंग, लाइजनिंग, लूट, चोरी सब कि जा रही है। एक दौर था जब पत्रकार का नाम सुनते ही इमानदार, सहनशील, सादगी की एक छवि उभरती थी। अखबार जनता हित के लिये सुर्खियां बटारेते थे। पहले टीवी का युग आया फिर डिजिटल युग शुरू  हो चुका है। डिजिटल युग न पत्रकारिता को उस दौर में पहुंचा दिया जिसे साफ शब्दों में कहे तो कोठे की तवायफ हो गयी है। जो चंद पैसों के लिसे किसी के सामने भी नाचेगी। सुबह के वक्त हर घर की जरूरत जहां अखबार हुआ करते थे तो वहीं शाम टीवी पर न्यूज चैनल के साथ, कुछ ही चैनल थे, जो सरकार की बखिया उधेड़ने के साथ देश के लिये खबरे चलाते थे। फिर डिजिटल के साथ मीडिया में राजनिति दखल ने 2005 के आसपास इसकी सूरत बदलनी शुरू कर दी। 2010 आते आते सैकड़ों अखबार, चैनलों ने मीडिया का स्वरूप ही बदल दिया। नौकरी के नाम पर महिलाओं का शोषण तो यहां आमबात है, शराफत का चोला ओढ़ा कर बड़े संस्थान के हो या छोटे खेल करने से बाज नहीं आते है यही वजह है  टेक्नोलॉजी के साथ ग्राफिक्स के खेल में राजनिति के गलियारों में मीडिया के कपड़े उतरने शुरू हो गये। आज के दौर में बड़े संस्थान से लेकर गली कूचों में चलने वाले डिजिटल मीडिया अपराधीकरण करने में कसर नहीं छोड़ी हर गलत कार्य में मीडिया की संलिप्ता लगातार सामने आ रही है।  अखबार, चैनलों में कम से कम अभी भी काबलियत का पैमाना जरूर मापा जाता है। डिजिटल मीडिया ने तो अपराधियों को भी शरीफ बना दिया है जो हाथ में कलम की जगह माइक और कमर में कट्टा लगाकर पत्रकारिकता कर रहे है। किसे लूटना है कब लूटना है, कहां लूटना है ये सब गैंग का बड़ा आका तय करता है। अगर पकड़े गये तो मेरा नहीं है वो आदमी, माल अंदर तो सब में बराबर बंदरबाट होगी। जनता भी समझ रही है , पुलिस भी समझ रहीं, नेता तो पहले ही समझ गये थे। अब आप भी समझ जाईये...सैकड़ों संस्थायें है पत्रकारों के हित की बात करने वाली पर उनमें एक भी ऐसी नहीं है जिसने अपने सदस्य बनाने के लिये एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया रखी हो। शराबी, हो दुराचारी हो या वूसलीबाज हो या अपराधी हो, बस पैसा दो सदस्यता लो वाला खेल चल रहा है। आम आदमी से यहीं कहूंगा ऐसे डिजिटल मीडिया वालों से सावधान रहें।0000साभार बर्निंग न्यूज


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