कोरोना एक गंभीर महामारी है और इंसानी जीवन के लिये खतरा है। लेकिन हम करपुरियें भी खतरों के खिलाड़ी है तभी तो न दिन देखते है न रात, जब मन किया घर से निकल लिये। मुंह में पान, मसाला दबायें, सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए जहां मन किया शहर की सड़क पर थूक कर रंगोली सी आकृति बना दी। किसी ने टोका तो कनपुरिया ज्ञान पेल दिया। भले ही लॉक डाउन में काम न होने पर सोशल मीडिया पर सरकार को कोसने मे कसर नहीं छोड़ी पर समाज और मोहल्ले के लिये कुछ न करने के बाद भी कोरोना योद्धा का सर्टिफिकेट जरूर ले लिया। अब सरकार अनलॉक की तरफ बढ़ी तो बेफिक्र और ज्यादा बढ़ गयी। सवारी वालों से कहा गया कि सवारी कम बैठाओं, उन्होंने सवारी वैसे ही ठूंस ठूंस कर भरनी शुरू कर दी। होटल वालों से कहा एहितयात बरतों उन्होंने मौज मस्ती वाले लौंडों को कमरा देना शुरूकर दिया। पुलिस ने कहा मास्क लगाओ नहीं तो चालान काट देंगे, मास्क नहीं लगाया, पर जब पुलिस को देखा तो रूमाल बांध लिया। फिर भी पुलिस ने रोका तो उन्हीं की वीड़ियों बना डाली। व्यापारियों को क्या कहे, देश की अर्थव्यवस्था का सारा दामोदार इन्हीं के कंधों पर है बीमारी फैलती है तो फैले,। कारखानों में काम करने वाले मास्क नहीं पहनतें, ग्लब्स नहीं पहनते है। पर कोरोना के नाम से सब ऐसे चौंक जाते है मानों पाकिस्तान भेजने की बात कह दी हो। दरअसल ये लापरवाही कनपुरियों को कितनी भारी पड़ सकती है से जानना हो तो एक बार कोरोना मरीज से फोन पर बात करके देखा तो तब पता चलेगा कि कोरोना क्या है। हर पल मौत का डर, डॉक्टर, स्टाफ पास नहंी आते है। खुद बुखार नापों, खुद पानी गर्म करों, बड़े से कमरे में कई लोगों के साथ सरकारी हिलते डूलते पंखे के नीचे मोबाइल से समय काटने वाले उन मरीजों से पूंछो जो खुद की और किसी और की लापरवाही से कोरोना की चपेट में आ गये। पर कनपुरियों को तो खतरे से खेलने की आदत हो गयी है। अभी भी वक्त है सुधरने का, रोजी रोटी तो जान रहने पर भी कमा लेंगे, बच्चे भी पल ही जायेंगे, कोरोना खतरनाक है पर उससे ज्यादा खतरनाक ये सोंच है कि हमे करोनों हमें नहीं होगा। देखिये अफसर कैसे दिन रात मेहनत कर रहें है सिर्फ आपके लिये वो भी कम संसाधनों में। अस्पतालों में जगह नहीं बची है, जांच किट मंहगी है। आपकी जरा सी सतर्कता कई लोगों की मेहनत बचाती है। सोचियें और सुधरियें, मास्क लगायें, घर से कम निकलें,

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