पत्रकारिता में ब्लैकमेलिंग या ब्लैकमेलिंग में पत्रकारिता

मेडिकल कालेज कानपुर के प्रिंसिपल आरती लाल चंदानी का जमातियों को लेकर सामने आया विवादित वीडियों सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। इस वीडियों के बहाने प्रिंसिपल पर तीर चलाने वाले भी सक्रिय है तो अब उनके पक्ष में आईएमए भी आ गया है। मुझे याद है कि मामूली बात पर झगड़ा होने पर हड़ताल पर जाने वाले डॉक्टर आज अपने प्रिंसिपल के साथ हुए खेल के बाद भी न तो हड़ताल कर रहे है और न मरीजों से कोई अभद्रता, बस अपना काम निष्पक्षता से करते हुए सेवा भाव कर रहे है, जो उनका मूल उद्देश्य और कर्तव्य दोनों ही है। इससे एक बात तो साफ है कि कोरोना काल में अगर कोई सबसे ज्यादा मशक्कत कर रहा है तो वो सिर्फ डॉक्टर है। अब सवाल उठता है कि क्या अपने कुछ फायदे के लिये जमातियों को लेकर दिये गये बयान का स्टिंग करना कहां तक जायज है। वो भी तब जब वहां बैठे कुछ संभ्रात पत्रकारों ने ही इस मुद्दे पर प्रिंसिपल से सवाल जवाब किये थे। मेरे विस्वास वाले सूत्रों ने बताया कि वहां बैठे कुछ लोगों ने जमातियों को लेकर अपना राय भी रखी थी। दरअसल जो हालात चल रहे थे, उससे उस वक्त लग रहा था कि जमातियों को लेकर एक वर्ग उनके खिलाफ ही कुछ सुनना चाह रहा था, सोशल मीडिया जमातियों की गलती का इंतजार कर रहा था, कब गलती हो और ज्ञानी लोग ज्ञान हौंकें। और हुआ भी ऐसा ही। भाव में बही आरती लाल चंदानी ने वो सब कह दिया जो पत्रकार अक्सर खबरों के लिये करते है। यहां बात करते है जर्नालिज्म की। इस एक मामले के बाद सरकारी विभागों में पत्रकारों को लेकर एक अजीब सा माहौल बन गया है। 70 दिन बाद वीडियों वायरल होने पर सीधा कटाक्ष पत्रकारों पर हो रहा है कि ब्लैकमेलिंग के लिये ये सब किया गया। खुद प्रिंसिपल ने भी इसे सोशल प्लेटफार्म पर जाहिर कर दिया। मामला जांच का विषय है। पर यहां एक सवाल उठता है कि क्या पत्रकार किसी की गलती को उजागर करे तो ब्लैकमेल कहा जायेगा। यानी की गलत करने वाले को गलत भी न कहा जाये। इस मामले में ये सूत्र लागू नहीं होता है। पर हकीकत सब जानते है कि घी सीधी ऊंगली से नहीं निकला तो ऊंगली टेडी कर ली पर घी भी जिद्दी था तब भी नहीं निकला, निकलेगा तो गरम होÞकर ही। पर इस तरह की घटनाओं से मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। 


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