मूंछ की लड़ाई में कुछ इस तरह शुरू हुई कानपुर अन्डरवर्ल्ड की कहानी

किसी ने सच कहा है कि  जमीम की भूख और वर्चस्व का झगड़ा बिना खून बहाये पूरा नहीं होता। मूंछों से शुरू हुई मामूली विवाद की कहानी ने कानपुर शहर के बीचों बीच कुली बाजार में एक परिवार को अपराध के रास्ते पर ढके ला तो खाकी की भी चूले हिल गयी। वो दशक भले ही 70-80 का था। पर दो गेंगों की गैंगवार और हराम की कमाई ने में 100 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। दो गैँंगों का वर्चस्व धीरे धीरे ऐसा बना की अन्डरवर्ल्ड डॉल दाउद इब्राहिम से लेकर मुंबई के डॉन करीम लाला तक जाकर जुड़ा। आईये आपको बताते है उन दो गैंगों की कहानी जिसमें 100 से ज्यादा युवा अपराधियों की भेंट चढ़ी तो कई पुलिस वाले भी आॅउट आॅफ टर्न प्रमोशन पा गये। बात 70-80 दशक की है। जब आजाद भारत की नींव पर अपना कानपुर भी अपनी मस्ती में विकास की ओर दौड़ रहा था। पर इन सब के बीच चमड़े के कारोबार औश्र जेबकतरी के लिये विख्यात हो रहे कुलीबाजार के एक मोहल्ले में दो परिवारों के बीच मूछों की लड़ाई ने बदमाशों का पूरा कुनबा बना दिया।

बोलती थी फहीम पहलवान की तूती
उस वक्त फहीम पहलवान और उसके पिता अकील पहलवान का वर्चस्व बोलता था। वक्फ की सम्पत्तियों पर कब्जा करने समेत रंगदारी जैसे मामलों में फहीम का नाम सामने आ चुका था। पुलिस रिकार्ड और पुराने रिटायर्ड कुछ दरोगाओं की माने तो फहीम सुबह पानी भरने के दौरान अब पुलिस रिकार्ड में डीटू गैंग के जनक शफीक की बहन को देखकर मूंछों पर ताव दे रहा था, यह बात शफीक का नागवार गुजरी और उसने फहीम को अपने भाईयों के साथ मिलकर पीट दिया था। यहीं से शुरू हुआ था एक बड़े गैंग के पनपने का बीज। फहीम इसका बदला लेने के लिये उस वक्त पुलिस के साथ मिलकर शफीक, रफीक बाले को पीटा और उन्हें जेल भी भिजवाया। जेल से छूटने के बाद शफीक ने अपना गँंग बनाया। उसके बाद शुरू हुई कानपुर अन्डरवर्ल्ड की कहानी। पुराने जानकार बताते है कि वक्फ की जमीनों, चरस, गांजा,स्मैक के धंधे में उतरे शफीक ने पूरा गैंग तीन साल में खड़ा कर लिया। उसके बाद अपने दुश्मन फहीम पहलवान के कई गुर्गो अपने साथ मिलाकर 1989 में गैंग के सदस्य जुम्मन हबड़ा का कत्ल कर दिया। यहीं से उसका नाम सुर्खियों में आ गया। 90 के दशह में कई धमाकों को अंजाम दे चुके दाउद इब्राहिम का नाम उठा तो शफीक ने वहां तक पैठ बना ली। 1993 से 1996 के बीच शफीक गैंग ने कानपुर समेत आसपास के कई जिलों में ताबड़तोड़ अपहरण, रंगदारी, लूट, डकैती,ख् असलहों की तस्करी स्मैक समेत कई बड़े लोगों की भाड़े पर हत्या का ठेका लिया तो मुंबई समेत खुफि या भी इस गैँंग के पीछे पड़ गये। पहली मुठभेड़ में शुक्लागंज में उस समयहुई जब तेज तर्रार इंस्पेक्टर विनय गौतम से हुई जिसमें दे पकडे गये थे। बाद में इसी इंस्पेक्टर से 2000 में हीर पैलेस में मुठभेड़ में डीटू गैंग के दो बदमाशों को मार गिराया था।

 2000 की शुरूआत में डीटू गैंग ने शहर में बड़ा गैंग खड़ा कर लिया था। उस वक्त उसका दुश्मान फहीम कमजोर पड़ चुका था। एसटीएफ और एसओजी के खौफ भी चढ़ने लगा था। इस बीच डीटूगैंग ने बड़ा कुनबा स्मैक, असलहा समेत अन्य धंधों में लिप्त होकर नये लड़कों को लगा दिया था। प्रदेस प शहर में कथित तौर पर आतंकी गतिविधियों में नाम सामने आने के बाद पुलिस की डायरी में डीटू गैंग के नाम से चढ़े शफीक, रफीक, बिल्लू बाले,अफजाल ने इजराइल आटे वाले, फूरकान, समेत कई शूटर बना लिये थे। उस वक्त पुलिस अफसरों में एक नाम खौफ के तौर पर लिया जाता था उन्हें ब्रजलाल उर्फ बर्घरा कहा जाता था जिन्होंने फहीम बदमाश को पैदल घसीटते हुए चौकी लेकर गये थे। डीटू गैंग के खात्मे के लिये पुलिस ने उनकी भी मदद ली। रिमांड पर लाये गये शफीक के भाई रफीक की दिन दहाड़े पुलिस की मौजूदगी में हत्या कर दी गयी थी। तब दो नाम सामने आये थे यह गैंग था डी34 जिसे संचाल्लित कर रहे थे। परवेज, बहार खान और गुलामनबी। इन तीनों का नाम सामने आते ही शहर में कई व्यपारियों में इतनी दहशत थी कि इनके नाम की पर्ची से ही रंगदारी मिलने लगी थी। इस गैंग के कई बदमाश अभी भी  मौजूद है। कई जेल में है। फू रकान, मोनू पहाड़ी की हत्या हो गयी। रईस बनारसी को बनारस मेंं मार दिया गया। इस गैंग के खात्मे की जहां बात आती है वहां एक इंस्पेक्टर क नाम भी सामने आता है जिसे ऋषिकांत शुक्ला कहते है।
20 साल पूर्व पुलिस के सामने मारी थी गोलियां

2005 में एसओजी ने डीटू गैंग के बदमाश और शफीक के भाई बिल्लू को मार गिराया। जिसके बाद यह गैंग टूटता गया। पर तब तक सौ से ज्यादा उन युवाओं की गैँंगवार में जान चुकी थी जिनके माता पिता ने गरीबी में भी अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देने की कोशिश की थी। रंगबाजी, बमबाजी के लिये कुलीबाजार, मेस्टन रोड समेत कई इलाकों में फहीम और शफीक गिरोह के वर्चस्व ने सैकड़ो घर बर्बाद कर दिया थे। इस रियल कहानी में कई ऐसे मुकाम और सच बाकी है जिन्हें अगली स्टोरी में बताऊंगा। साथ यह भी बताऊंगा कि कैसे इन गैंगों के चलते पहली बार कांग्रेस में मंत्री रहे एक कद्दावर नेता मेयर बने थे।



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