गैंगस्टर से खाखी की यारी खाखी पर पड़ी भारी

कानपुर। चौबेपुर का बिकरू गांव में पुलिस वालों पर आतंकियों की तरह गोलियां बरसाने वाले विकास दुबे और उसके गुर्गो ने कोई पहली बार ये खेल नहीं खेला था। छोटे से झगड़े अपराध की दुनियां में कदम रखने वाले विकास दुबे की कहानी किसी फिल्मी विलेन से कम नहीं है जो गुनाह करने के बाद अब गरीबों का मसीहा बनने की कोशिश में एक बड़ा गैंग खड़ा कर रहा था। पुलिस उसके बारे में जितनी जानकारी जुटा रही उससे पुलिस भी चकरा रही हैै। उसके टॉप लेविल के कनेक्शन समेत खास ड्राइवर विक्रम और साथी सोनू दुबे उसके खास थे। उसका साला राजू खुल्लर उसके लिये हर तरह का इंतजाम करता था। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि 2001 में दर्जा प्राप्त मंत्री की थाने के अंदर हत्या की घटना बाद संतोष शुक्ला के समर्थकों ने इसी बिकरू गांव में जमकर तांडव मचाया था। तब विकास दुबे और उसके परिवार के लोगों को थूक कर चटवाया गया था। बिकरू गांव के युवक विकास दुबे को अपना हीरो मानते थे। 

गाँव वालों का रॉबिन हुड बनने लगा था यह गैंगस्टर
आसपास के गांव में शादी ब्याह में जब तक विकास नहीं जाता था तब तक शादी की रौनक नहीं होती थी।    बिल्हौर से बिठूर तक चला था विकास का सिक्का
 बिल्हौर से लेकर बिठूर तक खनन, रंगदारी, फैक्ट्री वालों से वसूली समेत गावं के लड़कों की नौकरी दिलवाने का काम विकास करता था। उसकी तूती किस कदर बोलती थी कि शिवली से चलने वाले टेंपो तक में उसका नाम चलता था, अगर किसी ने बिकरू के विकास भईया नाम ले लिया तो उससे पैसा नहीं लिया जाता था। अपराध के साथ राजनीति संरक्षण के बाद अपराध दर अपराध करने वाले विकास दुबे की कहानी उसके कई खास इस घटना के बाद एक दूसरे को सुना रहे है। जिस बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों के खून से होली खेली वहां पुलिस अधिकारी एक्शन में है। विकास के किलेनुमा मकान को गिरा दिया, लगजरी गाड़ियों को कूंच दिया गया। उसके रिश्तेदार, आसपास के सौ मीटर के दायरे में रहने वाले हर युवक को पुलिस ने उठा लिया है। चौबेपुर हो या शिवली किसी भी थाने में विकास दुबे के किसी साथी का चुनाव के वक्त भी असलहा जमा नहीं होता था, किसी भी थाने में उसके गुर्गो के असलहा जमा होने का रिकार्ड तक नहीं मिलेगा। उसके परिवार में कई लोगों के नाम असलहों का लाईसेंस है। इतनी बड़े हत्याकांड को अंजाम देकर भागे विकास को पुलिस महकमे के विभिषणों ने पुलिस के हर एक्शन की जानकारी देकर सोंचा था कि हर बार की तरह वह भाग जायेगा। पर एसओ में गिरेंबा पर हाथ  डालने और एसओ विनय तिवारी द्वारा ये कहने के बाद कि विकास भईया ये बहुत मंहगा पड़ेगा विकास को अखर गया था।यही वजह रही कि पुलिस पहुंचने की सूचना पर वह भागा नहीं बल्कि उसने पूरी तैरूारी की थी। हालाकिं इस पूरे घटनाक्रम के कई पहलू सामने आने बाकी है। पर महकमे में जो चर्चा है उससे एक बात तो साफ हो गयी इस गैँगस्टर से पुलिस की यारी, पुलिस को ही भारी पड़ गयी। 

बिकरू गांव में हुए जघन्य हत्याकांड में पुलिस का दोहरा चेहरा सामने आया है। एसटीएफ के डीआईजी अनंत देव समेत कई अफसर विनय तिवारी से पूछताछ कर रहे है। पर अफसरों के सामने सब सच सामने आ चुका है। यहां एक बात जो मुख्य रूप से सामने आ रही है वह यह कि पुलिस की आधी अधूरी तैयारी पुलिस पर भारी पड़ी। दरअसल शहर में एसएसपी दिनेश कुमार पी अभी नये है, एसपी ग्रामीण ब्रजेश श्रीवास्तव को आये सिर्फ चार दिन हुए थे। उन्होंने तो अभी तक पूरे थानों का निरीक्षण भी नहीं किया था। चौबेपुर एसओ विनय तिवारी नये थे, शिवराजपुर एसओ महेश यादव नये, बिठरू एसओ भी नये सभी पहली बार थानेदार बने थे। चौबेपुर थाने में भी कोई पुराना सिपाही नहीं है। विकास की दहशत का आलम सब ने सुना था पर देखा नहीं था। यही वजह रही कि जब दबिश देने पुलिस गयी तो उन्होंने इसे आम अपराधी समझा था, न किसी ने जैकेट पहनी थी न किसी के असलहे इसके लिये तैयार थे। हैलट जब पुलिस के शव लाये गये तो किसी पर भी जैकेट नहीं थे। अफसरों से लेकर थानास्तर पर दबिश के दौरान की जाने वाले तैयारियों को अनदेखा किया गया।

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