कहते है खाकी की न दोस्ती अच्छी और न दुशमनी.. ये कहानी बिल्कुल फिल्मी भी है। पर जो भी हुआ वह खाकी की लाज बचाने की बड़ी कोशिश है। एक दुर्दांत अपराधी ने आठ पुलिस वालों को बेरहमी से मारा, उनकी लाशे जलाने की कोशिश की, उसे इत्मीनान था कि ,खाखी, खादी वाले उसे बचा लेंगे। उसकी दहशत कायम होने लगी थी। पर खाकी पर गोली चलाना विकास के अपराधिक साम्रज्य पर भारी पड़ गया। एक एक पुलिस वालों की शहादत का बदला पुलिस ने लिया वो भी अपने अधिकारियों की परवाह किये बगैर। पुलिस वाले खुश है.. जनता खुश है.. न चाहते हुए कई नेता भी खुश है...
आईये पहले नजर डालते है पूरे घटनाक्रम पर
तीन जुलाई को चौबेपुर एसओ विनय तिवारी के पास फोन पहुंचता है। दूसरी तरफ से आवाज आती है जय हिंद सर, सीओ बोले तैयारी करो इस विकास को उठाना है, इसका एक और पैर ठीक करना है.. फोट कट जाता है। उसके बाद शिवराजपुर एसओ महेश यादव को तैयार किया जाता है। ठीक 11 बजे सभी चौबेपुर थाने पहुंच जाते है। पर किसी को नहीं पता था कि विकास के मददगारों ने पुलिस वालों की कब्र खोद रखी है। सारी टीमें एकत्र होती है, सीओ देवेन्द्रमिश्रा सभी को दबिश के दौरान कहां कैसे क्या करना है समझाते है, ठीक 12.32 पर पुलिस बिकरू के लिये पुलिस निकलती है।
पहली गोली चलते ही गिर पड़े एसओ शिवराजपुर
बिकरू गांव में पहुंचते ही सीओ देवेन्द्र मिश्रा, एसओ शिवराजपुर, सिपाही राहुल और कुछ अन्य पुलिस वाले आगे बढ़ते है, तभी पहली गोली विकास के घर के सामने से चलती है जो सीधे एसओ शिवराजपुर को लगती है। सभी भागते है शिवराजपुर एसओ भी जेसीबी की तरफ भागते है और गिर जाते है। सीओ प्रेम दुबे के घर में घुसते है, तब तक दर्जनों गोलियां गूंज चुकी होती है, कई दरोगा, सिपाही घायल हो गये थे। कुछ देर बाद सीओ की मार्मिक आवाज आती है और गोलियां फिर से गरजने लगती ती है। घटनास्थल पर घायल सिपाही का यह रोंगटे खड़े कर देना वाक्या बयां किया।
और फिर शुरू हुआ खाकी का आंतक
आठ पुलिस वालों की हत्या के बाद यूपी पुलिस का खून खौल उठा, देखते ही देखते कई थानों की पुलिस, एसटीएफ और अधिकारी पहुंचे। आपरेशन विकास चलाया गया। प्रेम दुबे,अतुल दुबे को उसी दिन ढेर कर दिया, शुक्रवार यानी 10 जुलाई तक अमर, प्रभात बब्बन समेत विकास की कहानी खत्म हो गयी।
करोड़ा की डील,फिर भी मिली मौत
विकास दुबे के पकड़े जाने से लेकर उसे कानपुर तक लाने में बड़े स्तर का खेल चलता रहा। चर्चा रही कि कई करोड़ में उसे जेल तक पहुंचाने में डील की गयी, सब कुछ मैनेज हुआ, मीडिया को मोहरा बनाकर पीछा लगाया गया। पर किस्मत को कुछ और बदा था। सचेण्डी के पास मीडिया की गाड़ियों को रोका गया, और ठीक ही किया जो रोक दिया, मीडिया का ये काम भी नहीं कि किसी अपराधी को इस तरह प्रोटेक्शन दे। कुछ देर बाद विकास दुबे की मौत की खबर.. सब कुछ नाटकीय है पर ये नाटक जनता और पुलिस को अच्छा लगा। खास कर मुझे भी। ऐसे दुर्दांत अपराधी का अंत होना जरूरी था।
विकास दुबे की मौत के बाद करोैड़ों रूपये की सम्पति और करोड़ों रूपये दबाये बैठे कई रसूखदारों का मानों मन मांगी मुराद मिल गयी है। दहयशत के दम पर रंगदारी, वसूली और दबंगई करने वालों का हश्र यही होता है, इन्हीं में एक जय बाजपेई भी है। जिसने काले धन को सफेद किया। उसके कई मददगार अभी भी सक्रिय है।
कायम रखा पुलिस ने अपना इकबाल
विकास दुबे क्या मारा जायेगा या बच जायेगा... उज्जैन से गिरफ्तारी के बाद हर किसी की जुबान पर यही था, हर किसी को लगता था कि नाटकीय गिरफ्तारी हुई, मतलब नेताओं के आगे पुलिस बिक गयी और विकास बच गया.. पर आज की खबर ने जनता को यह तो बता दिया कि खाकी का इकबाल कायम है.. चाहे जितना दबाव हो... मै मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी धन्यवाद देता हूं जिन्होंने इस कांड के बाद किसी को भी नहीं बख्सने के सीधे आदेश दिये। पर अभी पिक्चर पूरी बाकी है।
साभार एसवी बर्निंग न्यूज
Comments
Post a Comment