लम्हों ने खतां की..सदियों ने सजा भुगती.. एक लम्बे दशक के बाद आखिर मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम माता जानकी और भाई लक्ष्मण के साथ भव्य मंदिर में विराजेेंंगे। मै सभी सिर्फ हिंदू नहीं बल्कि पूरे देश के हर उस शख्स को बधाई देता हूं जो अच्छी तरह से मानते है भारत की पावन भूमि सनातम धर्म के प्रहरी श्रीराम की भूमि है। पांच सौ दशक के बाद आयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर की आधारशीला पीएम रखेंगे। पूरा देश इस ऐतिहासिक क्षण को देखने को लिये ललायित है। कुछ लोगों ने मुझ कमेंट किया था कि भाई इस देश के मुसलमान को मंदिर से दिक्कत तो नहीं। उनके लिये बर्निंग न्यूज माध्यम से अपने मन की बात कह रहा हूं यकीन है मेरे जैसा यकीन और मान्यता उन सभी मुस्लिमों की होगी जिन्हें राम के अस्तित्व पर यकीन रहा है। मेरा बचपन टीवी पर रामायण देख कर और कहानियां सुनकर बीता है। मेरे जैसे लाखों लोग होंगे जिन्होंने भगवान राम के बारे में बचपन से सुना होगा। बाबर, अकबर, चंगेज और औरंगजेब की कहानियां सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गयी, शायद ही कोई मुसमान होगा आज के दौर में जिसे इनके बारे में याद होगा, पर भगवान राम के बारे में सभी को एक एक किस्से याद है। ऐसे में उन लोगों को मेरा जवाब है कि राम मंदिर का विवाद कभी था ही नहीं विवाद उस विवादित जमीन का था जिसके मालिकाना हक के लिये दो पक्ष लड़ रहे थे। अब भव्य राम मंदिर की नींव रखी जा रही है तो देश के मुसलमान को अगर दिक्कत हो तो वह देश छोड़ दे, क्योंकि अल्लाह ने तो कोरोना लाकर मस्जिद जाने का अधिकारी भी हमसे छीन लिया है। एक हिदायत के साथ कि अभी भी इबादत करों, बुरे काम से बचों। क्योंकि अल्लाह ने कभी नहीं फरमाया किसी और का हक मार कर इबादत मारकर दुआ कबूल नहीं होती है।
पहले तो जान ले राम मंदिर की कहानी
ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा पर थोड़ा फ्लैशबैक में चलते है। राम मंदिर का विवाद कोई नया नहीं है करीब पांच सौ सालों से हिंदू और मुसलमानों के बीच इसका विवाद था। अंगे्रजों ने इस विवाद का खूब लाभ भी उठाया। पहली बार यह विवाद 1885 में कोर्ट की दहलीज पर पहुंचा था, इतने लम्बे अंतराल के बाद साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासकि फैसले को पूरा कर दिया। जिसके बाद दो समुदायों के बीच पनपी रंजिश या यूं कहे की राजनीति की घिनौनी साजिश का पटापेक्ष होता दिख रहा है।
इसे भी जाने बारीकि से
मैं एक मुसलमान होने के नाते कभी कुछ नहंी लिखता, मै एक पत्रकार हूं और निष्क्षता से लिख्ना मेरा धर्म है। भले ही वह किसी भी कौम को बुरा क्यों न लगे। अगर कोई तथ्य या लेख में लिखे शब्दों से किसी को दिक्कत हो तो मै उसके लिये क्षमा प्रार्थी रहूंगा।
यहां ये भी जानना जरूरी है
पहले तो आपको बता दूं कि इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है। इंसानियता के पनपने के बाद ही इस्लाम का आगाज था, इसके कई प्रमाण मुस्लिम गं्रथों में उसी तरह मिलते है जिस तरह हिंदू ग्रंथ में सनातम धर्म के है। फिलाहल यहां बात श्रीराम की हो रही है। तो पहले उन भाईयों को बता दूं जो बाबरी मस्जिद को लेकर जले भूने है। भारत देश क्या पूरी दुनियां में बुत परस्ती चरम पर रही है। हमारे पैगम्बरों ने बुत परस्ती को हराम करार दिया जिसका जिक्र किताबों में है इससे ये साफ पता चलता है कि उस दौर में लोग मंदिर या मूर्ति बनाकर अराधना करते थे। ठीक उस तरह भारत में हजारों मंदिर रहे।
उस दौर में जब कोई राजा युद्व में जाते थे उनकी सेना जहां रूकती वहां पूजा पाठ के लिये मंदिर बनाती थी। कुछ यही प्रथा चलती रही। चार सौ साल पूर्व बाबर के सेनापति मीरबाकी ने भी कुछ ऐसा किया था। अयोध्या में मीरबाकी ने मंदिर तोड़ कर ही मस्जिद निर्माण कराया ये मै नहीं सकता हूं पर वहां मंदिर था इसके कई साक्ष्य मिले है।
ये भी सच है
अयोध्य में श्रीराम का मंदिर था इससे किसी को इंकार नहीं हो सकता है, पर जो ढांचा था उससे पता चलता है कि उस तरह की नक्कासी मंदिरों में होती है। ऐसे में ये कहना कि बाबरी मस्जिद तोड़ देना ठीक है ये गलत है। मस्जिद को तोड़ना एक गैरकानूनी कार्य था, जिसकी कीमत लाखों लोगों ने चुकायी है।राम मंदिर भव्य रूप लेगा, जिसमें हजारों लोगों को रोजगार भी मिलेगा, और अयोध्या नगरी एक अलग पहचान से पहचानी जायेगी। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि किसी समुदाय को भगवान श्रीराम के मंदिर से दिक्कत है। ये और बात है की गंदी राजनीति ने इस देश में ऐसा कुठरघात पनपाया कि दो समुदायों के बीच एक खाई बन गयी। आखिर क्यों फैलाया गया मुसलमान मंदिर नहीं बनने दे रहे हैे। साक्ष्य तो दोनों समुदायों के पास थे, ये फैसला कोर्ट पहले भी कर सकती थी। पर राजनीति की भेंट चढ़ी आस्था अगर तब पूरी होती तो न जाने कितने नेता आज लग्जरी गाड़ियों से न घूम रहे होते क्योंकि भगवान राम के नाम पर कईयों का नाम हो गया। अक्सर कहा जाता था मंदिर वहीं बनायेंगे पर तारीख नहीं बतायेंगे, लो भईया तारीख भी बता दी और बनाने भी जा रहे है.. अब राजनीति भगवान श्री राम के नाम पर न कर पाओगें।
खुद के स्वार्थ के लिये कई साल भगवान श्रीराम टेंट में रह लिये।
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