अपराधियों का राजनीति से चोली दामन का नाता अक्सर सुर्खियों में रहा है। यूपी की ऐतिहासिक धर्ती से कई ऐसे गैंगस्टर भी निकले है जो गरीबों के लिये राबिन हुड रहे, पर पुलिस के लिये हमेशा खलनायक ही रहें। लूट, हत्या, रंगदारी, अपहरण जैसे तमाम घटनाओं को अंजाम देने के बाद पूरे देश में पूर्वाचंल को अलग नाम देने वाले एक ऐसे अपराधी की कहानी दोबारा आपको बताने जा रहे है जो आज भी राजनीति का चोला ओढ़ कर खुद के खौफ को कायम किये हुए है। इस गैंगस्टर की कहानी में कई ऐसे पहलू है जो इसे हीरो भी बनाते है, पर कहते है अपराधी चाहे जितनी नेकिंया कर ले उसके गुनाह कम नहीं होते है। ये वो गैंगस्टरहै जो सांसद बनने के बाद भी भगौड़ा भी घोषित हुए। हम बात कर रहे है पूर्वांचल के बाहूबली अतीक अहमद की। जिसके नाम से ही यूपी के कई कारोबारी रंगदारी दे दिये करते थे। सौ से ज्यादा नइ्र उम्र के युवकों को अपराध का बादशाह बना चुके अतीक अहमद का कानपुर कनेक्शन भी रहा है। आज भी जाजमऊ में उसके तमाम गुर्गे मौजूद है जिनके बारे में एसटीएफ को लगातार जानकारियां मिलती रही।
अतीक अहमद एक नाम कम दहशत ज्यादा
1969 में श्रावस्ती जिले में माध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए अतीक अहमद ने 1979 में पहला कत्ल किया था। यहां से उनकी जरायम की दुनियां शुरू हुई तो 1989 में राजनीति चोला भी ओढ़ा। पूर्वांचल की गलियों से लेकर सड़कों तक उनके नाम का सिक्का चला। कम उम्र के युवकों को जोड़कर लूट, डकैती, हत्या, रंगदारी, फिरौती के घटनाओं को अंजाम देकर ये नाम कई स्टेट तक पहुंचा। बिहार से नेपाल तक बड़े वाहनों की चोरी के बाद उन्हें ठिकाने लगाने के लिये अतीक के सहयोग के बिना कुछ नहीं हो सकता था। पुलिस,एसओजी भी इस अपराधी के पीछे लगी रही। पर ये दहशत पनपती गयी।
राजनीति में कदम रखा तो बदल गया सूरतेहाल
अतीक की तूती यूपी में बोलने लगी थी तो जाहिर है बड़े नेताओंको भी ऐसे माफिया की तलाश थी। 1989 में विधायक के लिये अतीक ने राजनेताओं का दामन थामा और इलाहाबाद से पहली बार विधायक बने। कई बार चुनाव लड़ा और कद बढ़ता गया। पर असली टिवस्ट अब आने वाला था।
राजूपाल हत्याकांड के बाद पूर्व मुख्यमंत्री से ठनी
चुनावी रंजिश में राजूपाल को बीच सड़क गोलियों से भून दिया गया। इस घटना से पूरा यूपी दहल उठा साथ ही अतीक की सीधे पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सेठन गयी। सपा से 2004 में सांसदी का चुनाव लड़ कर अतीक सांसद तो बन गये पर उनके लिये राह सीधी नहीं थी। तब तक कई गैंगस्टर के मुकदमें दर्ज हो चुके थे। पासा पलटा और 2007 में मायामती मुख्यमंत्री बनी जिसके बाद अतीक के खराब दिन शुरू हो गये।
ये पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का खौफ ही था कि अतीक सांसद जरूर थे, बाहूबली भी थे, गुंडे माफियाओं की पूरी फौज थी पर नहीं था तो तत्कालीन यूपी सरकार पर यकीन नहीं था। ताबड़तोड़ कार्यवाही और कई इंकाउटर के बाद अतीक की समझ आ गया था कि पूर्वांचल में बाहूबली नहीं चलेगी। यहां से शुरूआत हुई एक सांसद के भगौड़ा बनने की कहानी।
भौगाड़ा सांसद कहने लगे विपक्षी
मुख्यमंत्री के खौफ से अतीक ने खुद को दिल्ली में सरेंडर कर जेल चला गया। उसके गुर्गे लगातार उसके लिये पैरवरी करते रहे ताकि यूपी में लाकर उन्हें मार न दिया जाये। इससे पहले पुलिस से भाग रहे अतीक ने कई माह तक खुद को छूपाये रखा। सांसदकाल में उनके मौजूद न होने पर कई पार्टी के सांसदों ने कहा था यूपी का एक भगौड़ा सांसद भी है। ये वाक्य इतना लोगों के जेहन में बैठ गया था अतीक के नाम के आगे भगौड़ा लगाने लगे थे। हालाकि उसकी दहशत कम नहीं हुई थी।
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