ये कहानी नही हकीकत है@सिर्फ कमजोर दिल वाले ही पढ़े

व्यपारी परेशान, आम आदमी हैरान.. और त्योहारों के झाम में उलझी कानपुर की कहानी अफसरों ने और बिगाड़ दी। हर किसी की जुबान पर सिर्फ कोरोना का नाम है, पर अफसर है कि नाकाम है। क्योंकि जनता बेलगाम है और ऊपर से जमातियों पर कोरोना फैलाने का इल्जाम है। अब ऐसे में न कोई अपना रहा न कोई पराया,कोरोना हुआ तो अपना भी पास न आया। ये हकीकत हमारे कानपुर की है जहां अफसरो के पास सिर्फ आंकड़ेबाजी है। शुरूआती दौर में पूर्व सीएमओ अशोक शुक्ला को पालने वाले शासन ने किसी अच्छे अधिकारी को तैनात किया होता तो शायद कोरोना थमता, और जनता परेशान न होती। शहर की हर गली, मोहल्ले, चौराहे, और बाजारों में कहीं खुशी कहीं गम के हालात है। पुलिस परेशान है, हर तीसरे गली में बांस बल्लियां पुलिस लगाती दिख रही है। दरअसल कोरोना की शुरूआत शहर में मार्च से हुई थी। पहले एक मरीज मिला उसके बाद जमातियों ने पूरी शिद्दत से कोरोना फैलाया, ऐसो प्रशासन और दूसरे समुदाय के लोगों ने बताया। उसके बाद जमाती ठीक हो गये और चले भी गये। लेनिक  कोरोना नहीं गया। पहले दस मिलते थे फिर बीस, फिर पचास फिर सौ फिर 160 अब दो सौ रोज मिलने लगे। डीएम साहब ने 10 थानाक्षेत्र में लॉकडाउन लगा दिया। बाकी जगह छूट है। क्योंकि कोरोना बेहद समझदार है वह दूसरे थानाक्षेत्रों में नहीं जायेगा। जहां बंदी करायी गयी वहां के लोग इतने समझदार है कि कहीं जायेंगे नहीं, ऐसा प्रशासन सोचता हैे। गरीब रो रहा है, त्योहार है, पैसा नहीं है, दुकानदार रो रहा है त्योहार है पर सामान कैसे बेंचे, पर सरकारी नौकर आराम से कोरोना को रोकने के लिये एसी कमरों में गाल बजा रहे है। शराब की दुकानों को खोल दिया गया है। साहब हमारी तो समझ में नहीं आ रहा है सरकारी फरमान और इसका झाम.. आपकी समझÞ में आये तो जस्र कमेंट करके बताईयेगा। कोरोना देवी ने आंखे खोल दी, क्योंकि कोई नहीं रहा इस कोरोना काल में----डॉक्टर कमा रहे, अस्पताल कमा रहे, व्यपारी रो रहा बाजार में
बच्चों की छूटिटया है मौज कर रहे टीचर, स्कूल हलकान है... 
इस कोरोना को रोकने में न जाने क्यों अफसर नाकाम है

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