बात जब बदमाशी की आती है तो लोगों के जेहन में मुंबई के डॉनों के नाम घूम या चेहरे पर घूम जाते है। पर कम लोगों को पता है कि पूर्वांचल के बदमाशों का दमखम ने पूरे देश में कोहराम मचाया है। आज हम आपकों एक ऐसे ही यूपी के डॉन के बारे में बताने जा रहे है जिसने 90 के दशक में कोहराम मचाया था। उसके कोहराम के चलते ही उत्तर प्रदेश में स्पेशल टॉस्फ फोर्स का जन्म हुआ। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के मामाखोर गांव में टीचर पिता, गृहणी मां और बहन के साथ रहने वाले इस डॉन का नाम सुनते ही 90 के दशक में बड़े बड़े बाहूबलियों के चेहरे की हवाईयां उड़ जाती थी। ये डॉन था श्रीप्रकाश शुक्ला
90 के दशक में राह चलती एक युवती के साथ छेड़छाड़ करने वाले राकेश नाम के युवक को गोली मार दी गयी थी। गोली मार कर अपराध का पहला इमला लिखने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी यहीं शुरू हुई। एक बड़े नेता के संरक्षण में आकर वह बैंकाक गया जहां से ट्रेनिंग के बाद लौटा तो गोरखपुर में कोहराम मच दिया। श्रीप्रकाश शुक्ला सिर्फ एक नाम ही नहीं दहशत का दूसरा नाम बन गया था। अखबारों के पन्ने हर रोज उसी की सुर्खियों से रंगे होते. यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी. नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्?वीर पुलिस के पास नहीं थी. बिजनेसमैन से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज. बस यही उसका पेशा था. और इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की
श्रीप्रकाश के साथ पुलिस का पहला एनकाउंटर 9 सितंबर 1997 को हुआ. पुलिस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ सैलून में बाल कटवाने लखनऊ के जनपथ मार्केट में आने वाला था. पुलिस ने चारों तरफ घेराबंदी कर दी. लेकिन यह आॅपरेशन ना सिर्फ फेल हो गया बल्कि पुलिस का एक जवान भी शहीद हो गया. इस एनकाउंटर के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत पूरे यूपी में और ज्यादा बढ़ गई.
श्रीप्रकाश शुक्ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी. मंत्री की हत्या उस वक्त की गई जब उनके साथ सिक्योरिटी गार्ड मौजूद थे. वो अपनी लाल बत्ती की कार से उतरे ही थे कि एके 47 से लैस 4 बदमाशों ने उनपर फायरिंग शुरू कर दी और वहां से फरार हो गए।
इस कत्ल के साथ ही श्रीप्रकाश ने साफ कर दिया था कि अब पूरब से पश्चिम तक रेलवे के ठेकों पर उसी का एक छत्र राज है श्रीप्रकाश यहीं नहीं रूका। उसने यूपी के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी। 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर एसटीएफ के लिए बम गिरने जैसी थी।
23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिलती है कि श्रीप्रकाश शुक्ला दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है. श्रीप्रकाश शुक्ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है. उस वक्त श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ था कि एसटीएफ उसका पीछा कर रही है. उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया. पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया।आज श्रीप्रकाश शुक्ला का कोई नाम लेने वाला भले ही नहीं हो पर उसकी तूती और रंगबाजी ने पूर्वांचल का बाहुबल बढ़ा दिया था। उसके तार कानपुर से लेकर कई स्टेट तक थे। राजनीति संरक्षण की बदौलत उसने दौलत, शोहरत और अय्याशी के ऐसे ऐसे काम किये जिसे सुनकर अच्छों अच्छों के होश उड़ जाये।
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