विकास दुबे हूं कानपुर वाला... इस एक शब्द ने अचानक से पूरे देश में कानपुरियों के लिये लोगों की अलग अलग राय बन गयी। क्या कानपुर के लोेग गुंडो बदमाश होते है.. या फिर रंगबाजों के शहर कानपुर में सिर्फ अपराध की पनपता है या फिर वीर शहीदों, आजादी के दिवानों, की ये सरजमी की यही पहचान रह गयी है।
विकास दुबे इस इस दुनियां में नहीं है उसका अपराधिक कुनबा भी समाप्त हो गया। एक झटके में बिकरू गांव से जन्मी दशहत का अंत हो गया।
क्योंकि इस दहशत ने खाकी पर हाथ डाल दिया था। पर बड़ा सवाल है कि कैसे विकास जैसे लोगों ने पुलिस को अपना गुलाम बना रखा था।
1993 से शुरू हुए अपराधिक इतिहास के बाद बिकरू के विकास दुबे ने पीछे पलट कर नहीं देखा। बड़ा गुंडा तब बना दर्जा प्राप्त मंत्री की थाने में हत्या कर दी थी।
यूं तो विकास के कई किस्से मशहूर है। पर कुछ किस्से हम आपको बताने जा रहे है वो बहुत कम लोगों ने सुने होंगे।
बिकरू गांव के बुजुर्गो ने बताया कि
विकास को सब पंडित जी कहते थे। पुलिस रिकार्ड में वो बदमाश था, पर चौबेपुर से शिवली तक उसका सिक्का चलता था, बिना पंडित जी की संरक्षण के मजाल है कोई घोटाला या विकास कार्य हो जायेगा।
राइस मिल और साबुन वालों को करोेड़ों की जमीन विकास ने अपनेसाथा अतुल, अमर के जरिये कब्जा करा दी थी।
जिस स्थान पर राइस मिल है उस पर काबिज किसान को रातो रात घर से उठा लाया गया था।
गांव के लोग बताते है 2014 के बाद से विकास ने अपने अपराध का अंदाज बदला था।
विकास के बारे में बताया कि गया उसने मादक पदार्थ का धंधा नहीं किया। लड़कियों से दूरी बना कर रखी, पर ये शौक उसने मौका मिलने पर पूरे भी किये।
आसपास के गांव में गरीब बहन, बेटियायें की शादी में खुलकर खर्च करता था। ज्यादातर उसे मामा कहती थी।
पुलिस के लिये लॉकडाउन में खाना बनवाने के साथ कई प्रशासनिक अफसर, बाबूओं की मदद उसने की।
उसके जानने वाले बताते है कि 1998 के आसपास के कल्याणपुर के एक इंस्पेक्टर को बीच सड़क पटक दिया था।
एक अधिकारी को घूस में बीस लाख दिये- दूसरे दिन उसके रिटायर्ड होते ही बंदूक की नोक पर पैसा ले आया था। तब उसका साथ गुडडन ने दिया था।
चौबेपुर में विकास कार्य के साथ इंडस्ट्रीयल स्टेट जैसा बनाने में विकास की अहम भूमिका रही थी। जिसके बाद लाखों की जमीन करोड़ों की बन गयी। जिन जमीनों पर बड़ी फैक्ट्री है उनके रिकार्ड तहसील तक में गायब मिलेगें। बेहद ख्चाास सूत्र बताते है कि चौबेपुर में ही बने एक बड़े वॉटर पार्क में कब्रिस्तान से लेकर किसानों की जमीनों का खेल विकास के दम पर हुआ था।
पत्नी के आने पर होती थी बड़ी दावत
बहुत कम लोगों को पता हागा कि विकास की पत्नी औरब ेटे जब भी गांव आते थे, विकास के घर पार्टी की जाती थी।
अमर, प्रभात, अतुल, प्रेम पांडे और उसके परिवार की महिलाओं समेत आसपास के गांव के दबंग युवक पूरी रात शराब पीकर हड़दंग मचाते थे।
घर के सामने नहीं लगाता था कोई ऊंची आवाज
विकास दुबे के खौफ का आलम यह था कि उसके घर के सामने कोई किसी को ऊंची आवाज में नहीं बुला सकता था। खास कर जब विकास शराब के नशे में हो। आसपास के गांव में शादी ब्याह का पहला न्यौता भी पंडित जी यानी विकास को जाता था। खास बात यह थी कि गांव में किसी ठीक ठाक परिवार के यहां शादी ब्याह में विकास के कहने पर पुलिस वाले दावत में जाते थे ताकि सामने वाले व्याक्ति का कद बड़ा रहे।
पहली बार पड़ा था ब्रेन अटैक
विकास दुबे की मौत के साथ कई राज दफन हो गये। विकास की पत्नी रिचा ने बताया था कि 2014 ्रके आसपास में विकास को एक गैर जनपद में ब्रेन अटैक पड़ा था तब वह एक माह अस्पताल में था, उसके बाद से वह एक अजीब बीमारी से ग्रस्त हो गया था। ये वो दौर था जब विकास के संपर्क में जय बाजपेई आया था और विकास ने अपराध के जरिये पैसा कमाने के नये तरीके खोजे थे।
90 के दशक में बर्रा थाने में तैनात रहे देवेन्द्र मिश्रा जो बिल्हौर सीओ थे उन्होंने विकास को न सिर्फ पकड़ा था बल्कि उसे बीच सड़क थप्पड़ मारे थे। उनके सीओ बिल्हौर बनने के बाद विकास दुबे ने उनहें भी एक बार दावत पर बुलाया था, सीओ के सरकारी नम्बर परअमर दुबे की दो बार कॉल की गयी थी। यह बात पुलिस विभाग में चर्चा का विषय रही है। पर सीओ ने उसके दरवाजा जाना तो दूर उससे बात तक नहीं की थी।
चौबेपुर के एसओ रहे विनय तिवारी पर भले ही मुखबरी का शक हो, पर हकीकत यह है कि विकास की दबंगई और बेइज्जती करने से वह भी बौखला गये थे, पर एक अधिकारी के चलते वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। खास बात यह है कि घटना से आठ घंटे पूर्व तक एसओ चौबेपुर ने एक बार फिर भी विकास को फोन नहीं किया था। ये तथ्य भी जांच में सामने आने की चर्चा है। पर मुखबरी थाने से की गयी इसके कई साक्ष्य मिले है।
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