बिकरू गांव में आठ पुलिस वालों की हत्या करने वाले विकास दुबे का नाम भले ही सुर्खियों में चल रहा हो पर एक वक्त था जब शहर के कुछ बदमाशों के जेल से छूटते ही अपराधी कई कारोबारी कांप जाते थे। इनका खौफ इतना था कि पुलिस इनके छूटते ही इन्हें फिर से जेल में ठूंसने के लिये लगी रहती थी, शायद यही वजह रही कि इनमे से कोई अपराधी सुधर नहीं पाया।
कानपुर की दबंगई पूरे देश में फेमस है, यहां के लोगों की रंगबाजी और यारबाजी ने हमेशा सुर्खियों में रही है आज हम आपको कुछ ऐसो अपराधियों के बारे में बताते है जिनका खौफ सर चढ़ कर बोलता था।
मुस्लिम क्षेत्र में एक नाम हमेशा दहशत का पर्याय रहा है। उसे लोग गुलामनबी कहते है। कई हत्या, लूट कर चुके इस शातिर का जुड़ाव डीटूगैंग से रहा है। कुछ सालों तक इस अपराधी के जेल से छूटते ही इलाके में एक ही चर्चा होती थी क्या गुलामनबी छूट गया.. अब फलां की खैर नहीं। और शायद एक दो माह भी ये अपराधी बाहर नहीं रह पाता था कि पुलिस किसी न किसी मामले में इसे जेल भेज देती थी।
दूसरा बड़ा नाम इसरार पग्गल, जिसकी तलाश में एसटीएफ कई माह तक शहर में छापेमारी करती रही। इसके ऊपर कई बड़े मामले दर्ज थे। अपराधियों को शरण देने के साथ खुद कई बड़े अपराध कर चुके इस अपराधी 2005 से 2010 त्र खूब आंतक मचाया था। ये वह दौर था जब डीटू गैंग के अतीक , शफीक की तूती बोलती थी।
एक नाम और शहर में आतंक का रहा जिसे मोनू पहाड़ी कहते थे। दिन दहाउÞे जूही में महिला को गोली मारने, या फिर कचहरी के पास दिन दहाड़े एक अपराधी की हत्या करना हो या फिर पुलिस पर गोली चलाना इसके लिये लिये यह कोई बड़ा काम नहीं था। 2006 में जब मोनू पहाड़ी जब से छूटा तो उसके साथियों ने बेकनगंज से चमनगंज तक रात में सैकड़ों राउंड गोलियां चला दी थी। पांच दिन बाद एक हत्या करने के बाद मोनू ने खुद को सरेंडर कर दिया था।
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