मुठभेड़ ये शब्द लगभग हर किसी ने सुना होगा, पर वास्तविक रूप से इसे किसी ने नहीं देखा, सिवाय पुलिस और बदमाशों के। क्योंकि मुठभेड़ होती ही इन लोगों के बीच है। पर पुलिस क्या वाकई सही मुठभेड़ करती है। एक पत्रकार होने के नाते इस पर ज्यादा ज्ञान देना ठीक नहीं है क्योंकि समाज के लिये अगर पुलिस किसी बदमाश को ठिकाने लगाती है तो वह उसका कर्तव्य भी है। पर असली मुठभेड़ बिकरू गांव की थी जब बदमाश पुलिस पर हावी दिखे और आठ पुलिस वालों की जान चली गयी। पर उसके बाद एक अलग विवाद भी सोशल मीडिया पर खूब उछला.. उस वक्त मैने उसे तवज्जों नहीं दी, पर दो दिन पूर्व ही मुख्तार अंसारी के शार्प शूटर रहे हनुमान पांडे को ढेर कर दिया। उस पर प्रयागराज से पचास हजार का इनाम था। उसके बाद सोशल मीडिया पर मैने कुछ कमेंट देखे जिसमें ब्राहमणों को विशेष तौर पर टारगेट करके मारा जा रहा जैसो कुछ लिखा था। फिर मैने सिर्फ दो साल पुराने प्रकरणों को देखा तो पाया कि बदमाशों को ढेर किया गया उनमे जाति विशेष के थे। मै जातिवाद पर लिखना नहीं चाहता हूं क्योंकि अपराधी सिर्फ अपराधी होता है कोई जात से उसे जोड़ना ठीक नहीं है। पर सिस्टम सवाल उठना लाजिमी है। अभी कुछ दिन पूर्व टॉप टेन अपराधियों की लिस्ट में क्या हनुमान पांडे कानाम था या नहीं। वहीं उसके पिता का एक चैनल में इंटरव्यू देखा जिसे हमारे पत्रकार मित्र रिसभमणि त्रिपाठी जी ने किया था। उसे बूढे पिता की कंपकाती जुबान और आंखों के आंसूओं ने मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया कि मुठभेड़ के नाम खुद पुलिस न्याय करके क्या ठीक कर रही है। माना हनुमान पांडे एक दुर्दात अपराधी था, उसे सजा कानून देता, अभी तक उसे किसी ने नहीं छूआ पर अचानक वह क्यों खटकने लगा, उसके पिता ने आरोप लगाया कि रात तीन बजे उसे उठाकर ले गये और मार दिया। उसके बाद सोशल मीडिया पर ब्राहम्णवाद को लेकर बहस होने लगी।मै नहीं समझ पा रहा हूं अचानक विकास दुबे, अमर दुबे, प्रभात, समेत जितने भी मारे गये सभी ब्राहम्ण थे का अलाप क्यों,उन्हें अपराधी की नजर से क्यों नहीं आंका जा रहा है। अगर शासन प्रशासन की मंशा वाकई यही है कि जातवाद के हिसाब से बदमाशों का खात्मा होगा तो ये किसी भी प्रदेश के लिये अच्छे संकेत नहीं हैे। क्योंकि हर जाति में बदमाशों का बोलबाला है। अपनी राय मुझे जरूर दीजियेगा... क्या वाकई सरकार की मंशा प्रदेश को भय मुक्त करने की है या इस तरह अपराधियों पर भय हावी दिखाकर आम आदमी को भय में रखने की।
किसी भी समुदाय विशेष की भावनाओं को अगर ठेस लगी हो तो मै क्षमा चाहता हूं, पर मुझे लगता है कि पुलिस को अपना काम करने देना चाहिये, बस तरीका सही हो, नहीं तो विरोध भी होना ठीक है।
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