धूल धंूआ,भ्रष्टाचारियो, लापरवाहों के बीच मुस्कुराता हूं, क्या करू कानपुर हूं बस चलते जाता हूं...
कभी रोता हूं कभी खिलखिलाता हूं तो कभी खुद के अभिमान पर इठलाता हूं...
ये सुर्ख इतिहास के पन्नों में यूं ही नहीं दर्ज हुआ मेरा अतीत, शहीदों की बलिदानी धरती पर खड़ा दूसरों को राह दिखाता हूं।
बेशक मेरा कानपुर भ्रष्टाचार से जुझ रहा है, खराब सड़कों, गढढो, बहन बेटियों क तार होती इज्जत, लव जिहादियों की करतूतों के बाद भी बेशुमार दर्द समेटे अक्सर रोता हूं। बारिश में टापू बनकर, गर्मी में शरीर को झुलसाने वाले थपेड़ों के बीच चलता रहता हूं। सर्द रातों में जब मेरी गोद में बेसहारा, गरीब फटे कम्बल में खुद को सिमेटता है तो सिसकता हूं, क्योंकि रंगबाजों में शुमार मेरे कनपुरिया यारों को हजारों, अपने शौक के लिये खर्च करते देखता हूं।
खुश होता हूं जब मेट्रो की पिलर मेरे सीने पर तनते है, उस दिन को याद करता हूं उस वक्त को याद करके जब मेरी सुनहरी और गर्व भरी पहचान में मेट्रो को दौड़ते हुए देखूंगा।
हां कभी कभी उदास भी होता हूं.. जब कोई बेटी की आबरू लूटती है, किसी का कत्ल होता, कोई बेटी गर्भ में मार दी जाती है, तो कई विवाहिता दहेज के लिये जला दी जाती है। रंगबाजाी और बमबाजी के मोहल्लों में शुमार कल्याणपुर, चमनगंगज, बेकनगंज, बाकरगंज अब सुधर गये तो अच्छा लगता है। मिलों को बंद देख पुरानी यादे ताजा हो जाती है। मोतीझील, फूलबाग, कटहरी बाग में जब जब प्रेमी जोड़ों को देखता हूं तो आधुनिकता पर भी हंसी आती है, मोबाइल के जमाने में हर किसी ने मुझे अलग अगल तरीके से कैद किया।
गर्व और ज्यादा बढ़ गया जब गंदगी से जुझने वाले अटल घाट पर महाआरती की गयी, मेरी पावन धरती को आर्शीवाद देने वाली मां गंगा को कनपुरियों ने जिस तरह से मान बढ़ाया, लगा कि मेरे दिन और तेजीसे बदलेगें।
तो ऐ मेरे कनपुरियां साथियों, अभी कोरोना चल रहा है, मास्क लगाओ, दूरी बढ़ाओ, दूसरों को भी मनाओं इसके लिये
क्योंकि मेरा अतीत तो तभी बचेगा जब तुम उसे बनाओंगे,। इस साल तो मानों मेरे सीने पर दुखों का पहाड टूटा है, कोरोना में मजदूरों को रोते तो खाकी को खून से लाल देखा है। खैर खैर खैर
मेरे अतीत के पन्नों में अभी होली, दिवाली, आजादी के दिवानों की हजारों यादों है जिन्हें फिर कभी साझा करूगां।
आपने अधूरे, टूटे शब्दों के साथ रंगबाज, यारबाज, कानपुर को प्रणाम
आपका शाहिद पठान
Comments
Post a Comment