किसान आंदोलन को कुचलने की राजनीति साजिश का शिकार हुए अन्नदाता

आखिर वही हुआ जिसका डर था। किसान आंदोलन को देशद्रोहियों काआन्दोलन साबित करने के लिये पार्टी विशेष ने वही चचाल दोहरायी जो चुनाव जीतने के लिये दोहरायी थी। यानी की राष्टÑवाद हम भारतीय जान दे देते है पर राष्टÑ पर आंच नहीं आने देते, शायद यही वजह है कि किसान आन्दोलन को कथित राष्टÑवाद के नाम पर हिंसा की आग में झोंक दिया गया। किसान ये नहीं समझ पाये कि उनकी रैली की अनुमति फिर भीड़ से एक पत्तर उछालने की कला में माहिर पार्टी विशेष के लोग उन्हें अपराधी बना देंगे। 
दिल्ली में इतने दिनों से चल रहा किसानों का धरना प्रदर्शन सरकार के लिये गले की फांस बना हुआ है। 
सवाल सीधा है कि जब किसान खुद अपना भला नहीं चाहते है तो सरकार क्यों उनका जबरदस्ती भला करना चाहती है।
कानून वापस लेने की मांग को लेकर अड़िग किसानों ने नहीं सोंचा था जिस तिरंगे के साये में वे आन्दोलन कर रहे है, उउसी के अपमान का कथित राष्टÑवाद भूना कर उन्हें देशद्रोही बनाने के मंसूबे गर्म कमरों में बनाये जा रहे थे। ये जगजाहिर भी हो गयया। बहुत कम सुना होगा कि किसी आन्दोलन के खिलाफ खुद जनता सड़कों पर उतरे। जैसे ही सिंधू बार्डर पर आज हुआ। 
ऊपर से गोदी मीडिया के दल्लों का खेल देखियें, दल्ला गोहरामी के चैनल पर किसानों को गुंडा बताया गया। 
मेरा सवाल है कि जब गौहत्या के आरोप पर भीड़ किसी को पीट पीट कर मार डालती है तब उन्हें गुडा बताने पर क्यों जुबान सील जाती है। 
जब किसी बहन बेटी की आबरू लूट जाती है, लोग आन्दोलन करते है पुलिस लाठियां चलाती है और भीड़ उनहें निशाना बनाती है तब पुलिस बेचारी क्यों नहीं होती। जवाब साफ है कि तब गोदी मीडिया को अपने आकाओं के तलवे चाटने का मौका नहीं मिलता है। हां अगर जहां घटना हुई हो वहां सरकार सपा, बसपा की होगी तो कानून व्यवसथा पर सवाल उठेगा। 
मै धन्यवाद करता हूं सोशल मीडिया का जिसने किसानों के शांमिपूर्ण आन्दोलन के साथ हिंसा करने वालों के चेहरे बेनाकब किये। अब वाकई जरूरत है कि किसानों के आन्दोलन में आम आदमी भी जुड़े क्योंकि विरोध सिर्फ कानून का नहीं बल्कि हिटलरीशाही का भी होना चाहिये। शाहिद पठान कनपुरिया

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