ये गरीब है, भीख मांगते है, न इनका कोई ठिकाना है न कोई पहचान है.. फिर भी इनके दिल में अपने देश के लिये इज्जत है, संविधान पर भरोसा है भले ही सरकारी मशनरी में इनकी कोई पहचान न हो सरकार इन्हें बड़ी सुविधायें न देती हो पर एक चीज है जो हमारा संविधान इन्हें जरूर देता है.. और वो है न्याय, जी हां वहीं न्याय जिसके लिये हर तबका पुलिस और कोर्ट के पास जाता है। पिछले दो दिन से शहर पुलिस पर घूस के लगे कलंक को खुद पुलिस ने ही धोया तो ये गरीब मां ने हाथ जोड़कर सिर्फ इतना ही कहा पुलिस वाले बाबू धन्यवाद... .
फिलहाल किशोरी को पुलिस ने बरामद कर लिया पर अपने लेकिन सवाल यहीं है कि आखिर पुलिस है किसके लिये कोई भेदभाव तो पुलिस कभी करती ही नहीं मित्र पुलिस आपकी सेवा में तत्पर... ये स्लोगन शहर पुलिस पर यूं ही सटीक नहीं बैठता है, इसके पीछे पुलिस की पूरी मंशा भी जाहिर होती हैे। दरअसल हमारी शहर पुलिस ने लॉकडाउन में गरीबों को खाना खिलाना हो या पिछवाड़ा लाल करना किसी में फर्क नहीं किया।
जब जहां जैसी जरूरत हुई वहां मानवता पेश की। अब देखिये ना एक गरीब दिव्वांय महिला की बेटी को खोजने के लिये चौकी इंचार्ज ने 12 हजार वसूल लिये, तो इतना हल्ला मच गया। अरे भई ये कोई नहीं बात थोड़े ही नहीं है। कई ऐसे पुलिस वाले है जिन्होंने अपनी जेब से गरीबों की मदद कर मिसाल कायम की है ऐसे में एक दरोगा ने गरीब से वसूली कर ली तो कौन से बड़ी बात हैै। सीधी सी बात है पुलिस वसूली में कोई भेदभाव नहीं करती है, न पुलिस विभाग में भेदभाव की जरूरत है। चाहे ट्रैफिक पर लगा होमगार्ड हो या थाना पुलिस का सिपाही, दरोगा, इंस्पेक्टर, वसूली में भेदभाव नहीं करते है। यकीन न हो तो किसी भी चौकी में छोटे से छोटे और बड़े से बैड़े मामले देख लीजिये, बिना भेदभाव के एक सामान सबसे वसूली का नियम है। हां कुछ अच्छे अफसर भी है, जो लोगों की मदद करते है, पर उनकी मदद इन वसूलीबाजों के सामने फीकी है।
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