कानपुर बिकरुकाण्ड में एसटीएफ के बड़ा खुलासा, पुलिस की नाक के नीचे छिपा रहा विकास दुबे

कानपुर 1 मार्च। देश के चर्चित बिकरू कांड में आठ पुलिस वालों की हत्या करने वाले विकास दुबे दो दिन तक कानपुर के आसपास ही छिपा रहा पर पुलिस उसे नहीं पकड़ पायी। यूपी पुलिस ने हर प्वाइंट पर सक्रियता दिखाने का दावा तो किया पर उनके दावों की पोल खुद एसटीएफ की कार्यवाही के बाद पकड़े गये आरोपियों ने खोल दी।
एसटीएफ एडीजी अमिताभ यश ने प्रेस वार्ता कर विकास दुबे के मददगारों को असलहों के साथ गिरफ्तार किया हैै। एडीजी एसटीएफ अमिताभ यशने बताया कि बिकरू गांव में दबिश के दौरान सीओ बिल्हौर देवेन्द्र मिश्रा, समेत आठ पुलिस कर्मियों की हत्या की घटना को अंजाम देने के बाद विकास दुबे, अमर दुबे और प्रभात मिश्रा बिकरू गांव से भागकर शिवली पुल के पास जाकर छुप गए थे। प्रभात मिश्रा ने अपने मित्र विष्णु कश्यप से संपर्क किया और उसे शिवली नदी के पास बुलाया। इसपर विष्णु कश्यप शिवली निवासी अपने दोस्त छोटू की स्विफ्ट डिजायर कार लेकर आया।कार से सभी रसूलाबाद विष्णु कश्यप के बहनोई रामजी उर्फ राधे के घर तुलसीनगर रसूलाबाद पहुंचे और वहीं शरण पायी। इस दौरान टीवी चैनलों के जरिये पुलिस की कार्यवाही पर नजर रखे रहे। 
पुलिस के मुताबिक 3 जुलाई 2020 की दोपहर लगभग 12:00 से 1:00 बजे के बीच रामजी उर्फ राधे अपनी मोटरसाइकिल से अमर दुबे को रसूलाबाद सेकरिया झाला में संजय परिहार उर्फ टिंकू की बगिया ले गया। वहां पर संजय परिहार, अभिनव तिवारी, अर्पित मिश्रा, विक्की यादव, अमन शुक्ला और मोहन अवस्थी मौजूद थे। अमर दुबे ने उत्तम मिश्रा से रुकवाने की व्यवस्था करने के लिए कहा था। उसने अमर दुबे को अपने खेत के ट्यूबवेल वाली कोठरी में रुकवा दिया। इसके बाद रामजी और अभिनव तिवारी दो मोटरसाइकिल से तुलसी नगर रसूलाबाद लौट गए। पांच जुलाई की शाम को शुभम पाल की ओमनी कार से विकास दुबे, अमर दुबे और प्रभात मिश्रा को औरैया बस स्टैंड तक छोड़ा गया। यहां से तीनों फरीदाबाद हरियाणा पहुंचे। 
एसटीएफ के मुताबिक फरीदाबाद से विकास दुबे महाकाल के मंदिर कैसे पहुंचा, इसकी कड़ी अभी तक नहीं मिली है। 

पुलिस की जांच के दौरान सामने आया था कि हमलवारों ने पुलिस टीम पर सेमी आॅटोमेटिक राइफल से फायरिंग की थी। पुलिस ने मौके से अमेरिकन विंचेस्टर कारतूस बरामद किए थे। पुलिस अबतक मामले में आरोपित 36 लोगों को जेल भेज चुकी है। अभी तक पुलिस को न तो विकास की सेमी आॅटोमेटिक राइफल बरामद हुई थी और न ही फरारी के समय उसे आश्रय देने वालों का पता चला था। पुलिस को वारदात में दो सेमी आॅटोमेटिक राइफल के प्रयोग होने की जानकारी मिली थी, जिनका प्रयोग विकास दुबे करता था। उसका लाइसेंस भांजे और छोटे भाई के नाम पर था।

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