तालिबानी, असल मुद्दे और मीडिया

आज के दौर में मीडिया और जर्नालिज्म के मायने पूरी तरह बदल चुके है। हम कहने को तो देश के इमानदार और शूरवीर पत्रकार है पर हकीकत यह है कि बेहद डरे हुए, जंजीरों में बंधे हुए है। टीवी चैनल पर जो दिखाया जाता है उसे तय कौन करता है। तालीबान ने अफगान पर कब्जा कर लिया। जाहिर ये खबर हर कोई देखना चाहता है। पाकिस्तान में टीक टॉक गर्ल के साथ जो हुआ वह किसी भी देश को शर्मसार करने के लिये काफी है। पर क्या ये खबरे पूरे दिन की हेडलाइन होनी चाहिये। 
एक पत्रकार के होने के नाते मैने बहुत सोंचा समझा, और ब्लाक के माध्यम से अपने मन मंथन को आपके सामने रख रहा हूं। हो सकता है मै गलत सोंच रहा हूं। हो सकता है टीवी चैनलों की हालत को न समझ पा रहा हूं, पर एक बात अच्छी तरह समझ रहा है कि जो हम देख रहे है या जो लिख रहे उसे जनता समझ रही है।
देश के कई शहरों प्रदेशों में पाकिस्तान जैसी घटनाये अपने यहां रोज होती है। बस फर्क इतना है कि उस टिक टॉक गर्ल को चार पांच सौ लोगों ने नोंचा, और अपने देश में चार, पांच या एक दो नोंचते है, पर नोंची बेटियां जाती है। 
तालीबान कितना कुख्यात ये दिखाने में टीवी चैनल टीआरपी सेट करते है पर प्रदेश में देश में न जाने कितने लोगों के साथ सिस्टम कूरू्रता करता है, वो नहीं दिखता है। 
आप  खुले नाले में गिर गये मौत हो गयी, क्या ये क्रुरूता नहीं.. बारिश से खराब सड़क तालाब बन गयी आपका बच्चा डूब गया..
लन जेहाद के नाम पर पीट पीट कर हत्या हो गया क्या ये क्रुरूता नहीं।
वोटों के लिये हिंदू मुस्लिम को लड़वा दिया, खून बह गया जान चली गयी क्या ये कु्ररूता नहीं है। पैसा न मिलने पर पुलिस ने पीट कर मार डाला. दहेज न मिलने पर ससुराल वालों ने जला कर मार दिया। 
नौकरी न मिलने पर बेरोजगार ने जान दे दी। घूस न देने पर सरकारी आफिस में काम नहीं हुआ, लाचार ने जान दे दी क्या ये कु्ररूरता नहीं है। अगर नहीं है तो मेरा भारत वाकई महान है..
हमारे टीवी चैनल अखबारों के पास तालीबान अगफान में क्या हुआ ये दिखाने के लिये बहुत मसाला है, हमारे शहर में अव्यवस्थाओं का बोलबाला है ये दिखाने का वक्त नहीं। आक्सीजन नहीं, क्रब्रिस्तान और मरघट में जगह नहीं ये दिखाने का वक्त नहीं क्योंकि ये टीआरपी नहीं देते है। 
भला हो सोशल मीडिया को जो चंद मिनटों में बहुत सच सामने आ जाते है।
पर ये जर्नालिज्म में नहीं आते है। आप सरकार से सवाल नहीं पूंछ सकते, जो सरकार कहेगी वही सच होगा, पर कु्ररू तालीबानी है...जर्नालिज्म के नाम पर नफरत, चुनावी समीकरण जिस तरह से बनाये जा रहे है और असली मुद्दो से भटका कर मीडिया खुद की फजीहत करा रहा है। ये सोचनीय है। sv burning post

Comments